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अमेरिका ने शांति समझौते का उल्लंघन किया तो कड़ा जवाब देगा ईरान: गालिबफ

ईरान और अमेरिका के बीच लंबे तनाव और संघर्ष के बाद हुए शांति समझौते के बावजूद दोनों देशों के रिश्तों में सतर्कता बरकरार है। ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेर गालिबफ ने स्पष्ट किया है कि यदि अमेरिका समझौते की शर्तों से पीछे हटता है या अतिरिक्त दबाव बनाने की कोशिश करता है, तो ईरान कड़ा जवाब देने से नहीं हिचकेगा। वहीं, होर्मुज जलडमरूमध्य के दोबारा खुलने से वैश्विक ऊर्जा बाजार को भी राहत मिलने की उम्मीद बढ़ गई है।

समझौते के पालन पर जोर, उल्लंघन पर चेतावनी

ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेर गालिबफ ने कहा है कि तेहरान शांति समझौते की सभी शर्तों का सम्मान करने के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन यदि अमेरिका किसी भी प्रकार से समझौते का उल्लंघन करता है तो ईरान इसे स्वीकार नहीं करेगा। सोशल मीडिया पर जारी अपने संदेश में गालिबफ ने कहा कि देश का नेतृत्व जो जिम्मेदारी सौंपेगा, उसे पूरी निष्ठा के साथ निभाया जाएगा। उन्होंने संकेत दिए कि किसी भी संभावित उकसावे या अतिरिक्त मांगों का जवाब मजबूती से दिया जाएगा।

युद्ध का अनुभव याद दिलाकर दी सख्त चेतावनी

गालिबफ ने अपने बयान में कहा कि हालिया संघर्ष के दौरान विरोधी पक्ष को ईरान की क्षमता का अनुभव हो चुका है। उन्होंने कहा कि यदि भविष्य में फिर से वही परिस्थितियां पैदा की जाती हैं, तो जवाब पहले से अधिक कठोर हो सकता है। उनके इस बयान को अमेरिका के लिए एक स्पष्ट संदेश माना जा रहा है कि शांति बनाए रखने के लिए दोनों पक्षों को समझौते की शर्तों का सम्मान करना होगा।

होर्मुज जलडमरूमध्य में फिर लौटी सामान्य गतिविधियां

दोनों देशों के बीच समझौता होने के बाद रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री गतिविधियां सामान्य होने लगी हैं। रिपोर्टों के अनुसार, इस मार्ग पर जहाजों की आवाजाही में तेजी आई है और पहले की तुलना में ट्रैफिक बढ़ता दिखाई दे रहा है। यह जलमार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद अहम माना जाता है और इसके सुचारु संचालन से अंतरराष्ट्रीय व्यापार को राहत मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।

तेल और गैस बाजार में राहत की बढ़ी उम्मीद

होर्मुज मार्ग के खुलने और समुद्री प्रतिबंधों में कमी आने के बाद दुनिया भर में तेल और गैस की आपूर्ति को लेकर बनी चिंताएं कम होने लगी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शांति समझौता स्थायी रूप से लागू रहता है, तो ऊर्जा बाजार में स्थिरता लौट सकती है और कीमतों पर दबाव घट सकता है। इससे उन देशों को विशेष राहत मिलेगी जो बड़े पैमाने पर तेल और गैस आयात पर निर्भर हैं।

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