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अमेरिका का नया टैरिफ बिल: रूसी तेल पर भारत की बढ़ी चिंता, लेकिन कितना बड़ा है खतरा?

रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर 100% टैरिफ लगाने के प्रस्तावित अमेरिकी बिल को 60 सीनेटरों का समर्थन मिलने के बाद भारत में नई चिंता पैदा हो गई है। यदि यह बिल कानून बनता है तो भारत के ऊर्जा आयात और अमेरिका के साथ व्यापारिक रिश्तों पर असर पड़ सकता है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल घबराने की जरूरत नहीं है, क्योंकि बिल के कानून बनने और प्रभावी तरीके से लागू होने की राह अभी आसान नहीं है।

60 अमेरिकी सीनेटरों का समर्थन, भारत समेत पांच देश निशाने पर

अमेरिका में पेश किए गए ‘सैंक्शनिंग रशिया एक्ट ऑफ 2026’ को 60 सीनेटरों का समर्थन मिलने से यह प्रस्ताव चर्चा के केंद्र में आ गया है। इस बिल का उद्देश्य रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर आर्थिक दबाव बनाना है। प्रस्ताव के अनुसार भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान से आने वाले कुछ उत्पादों पर 100% तक टैरिफ लगाया जा सकता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी इस विधेयक का समर्थन किया है और इसे अगस्त से पहले सीनेट से पारित कराने की कोशिश की जा रही है।

भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए क्यों अहम है रूसी कच्चा तेल

पिछले कुछ वर्षों में रूस भारत के सबसे बड़े कच्चे तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल हो गया है। जून के आंकड़ों के अनुसार भारत ने रूस से लगभग 2.6 मिलियन बैरल प्रतिदिन (mbd) कच्चा तेल आयात किया, जो कुल आयात का आधे से अधिक हिस्सा है। रियायती दरों पर मिलने वाले रूसी तेल ने भारतीय रिफाइनरियों को लागत कम रखने, ईंधन की स्थिर आपूर्ति बनाए रखने और घरेलू बाजार में महंगाई को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यही वजह है कि भारत के लिए यह सिर्फ व्यापार नहीं बल्कि ऊर्जा सुरक्षा का भी बड़ा आधार बन चुका है।

यूरोपीय देशों को राहत, भारत और चीन पर सख्ती का प्रस्ताव

दिलचस्प बात यह है कि प्रस्तावित बिल में कई यूरोपीय देशों को छूट दी गई है, जबकि वे अब भी रूस से गैस खरीद रहे हैं। अमेरिकी सांसदों का तर्क है कि इन देशों ने रूस पर अपनी निर्भरता कम करने की दिशा में ठोस कदम उठाए हैं और उनकी कुल ऊर्जा जरूरतों में रूसी गैस की हिस्सेदारी सीमित है। दूसरी ओर भारत और चीन जैसे बड़े खरीदारों को इस बिल के दायरे में रखा गया है। इससे वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर व्यापक प्रभाव पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

विशेषज्ञ बोले- कानून बनने और लागू होने की राह आसान नहीं

व्यापार और वैश्विक अर्थव्यवस्था के जानकारों का मानना है कि फिलहाल इस प्रस्ताव को लेकर अत्यधिक चिंता करने की जरूरत नहीं है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा ही एक प्रस्ताव लंबे समय तक अमेरिकी सीनेट में लंबित रहा था और उस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी। उनका तर्क है कि यदि नया बिल पारित भी हो जाता है, तब भी उसे प्रभावी रूप से लागू करना आसान नहीं होगा। अमेरिका पहले भी रूस से तेल खरीद को लेकर भारत पर अतिरिक्त शुल्क लगाने की कोशिश कर चुका है, लेकिन चीन के खिलाफ समान कार्रवाई नहीं की गई थी।

भारत की रणनीति क्या हो सकती है?

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अपनी ऊर्जा नीति राष्ट्रीय हित और ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखकर तय करनी चाहिए। रूस से मिलने वाला सस्ता कच्चा तेल भारतीय अर्थव्यवस्था और ईंधन कीमतों की स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण साबित हुआ है। ऐसे में यदि भविष्य में अमेरिका की ओर से दबाव बढ़ता भी है तो भारत को अपने आर्थिक हितों, ऊर्जा जरूरतों और वैश्विक कूटनीतिक संतुलन को ध्यान में रखते हुए फैसला लेना होगा। फिलहाल इस बिल के कानून बनने और उसके प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।

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