डूंगरपुर में जीवंत हुई ‘धाड़’ परंपरा, पुरुष वेश में महिलाओं ने निकाली वर्षा यात्रा
डूंगरपुर के आदिवासी अंचल में अच्छी बारिश की कामना को लेकर सदियों पुरानी ‘धाड़’ परंपरा का आयोजन किया गया। मोरा सारण, डूंगरवाड़ा सहित आसपास के गांवों में महिलाओं ने पुरुषों का वेश धारण कर जुलूस निकाला और इंद्रदेव से क्षेत्र में समय पर वर्षा होने की प्रार्थना की। लोकगीत, भजन-कीर्तन और पारंपरिक वेशभूषा के साथ आयोजित इस अनुष्ठान में बड़ी संख्या में ग्रामीणों ने भाग लेकर अपनी सांस्कृतिक विरासत को जीवंत किया।
पुरुष वेश में महिलाओं ने निभाई अनोखी लोक परंपरा
डूंगरपुर के मोरा सारण, डूंगरवाड़ा और आसपास के गांवों में महिलाओं ने पारंपरिक सफेद धोती-कुर्ता पहनकर, सिर पर साफा बांधकर और हाथों में लाठी, तलवार व कृषि उपकरण लेकर गांव की गलियों में जुलूस निकाला। पूरे आयोजन के दौरान महिलाएं भजन-कीर्तन और लोकगीत गाते हुए इंद्रदेव से अच्छी वर्षा की कामना करती रहीं। इस अनूठी परंपरा ने गांव के माहौल को आस्था और उत्साह से भर दिया, वहीं ग्रामीणों ने भी जगह-जगह जुलूस का स्वागत कर इसमें अपनी भागीदारी निभाई।
इसे भी पढ़ें – जयपुर में सोनम वांगचुक के समर्थन में प्रदर्शन, टेंट हटने के बाद सड़क किनारे खड़े होकर जताया विरोध
कम बारिश होने पर निभाई जाती है ‘धाड़’ की परंपरा
ग्रामीणों के अनुसार ‘धाड़’ परंपरा कई पीढ़ियों से चली आ रही है। मान्यता है कि जब क्षेत्र में पर्याप्त वर्षा नहीं होती, तब महिलाएं पुरुषों का स्वरूप धारण कर यह विशेष लोक अनुष्ठान करती हैं। स्थानीय विश्वास के मुताबिक इस आयोजन से इंद्रदेव प्रसन्न होते हैं और क्षेत्र में अच्छी बारिश होती है। यही आस्था आज भी ग्रामीण समाज को अपनी सांस्कृतिक परंपराओं से मजबूती से जोड़े हुए है।
युवा और बुजुर्ग महिलाओं ने बढ़-चढ़कर लिया हिस्सा
इस धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन में केवल युवा महिलाएं ही नहीं, बल्कि बुजुर्ग महिलाओं ने भी पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ भाग लिया। जुलूस के दौरान ग्रामीणों ने वर्षा की कामना करते हुए किसानों की फसलों के लहलहाने और क्षेत्र में खुशहाली आने की प्रार्थना की। गांव के कई स्थानों पर लोगों ने महिलाओं का स्वागत किया और इस लोक परंपरा में शामिल होकर सामूहिक आस्था का परिचय दिया।
लोक संस्कृति और सामाजिक एकजुटता का प्रतीक बनी परंपरा
ग्रामीण नारायण गरासिया ने बताया कि आधुनिक दौर में भी ‘धाड़’ परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान, सामाजिक एकता और लोक संस्कृति के संरक्षण का सशक्त माध्यम है। यह आयोजन बताता है कि वागड़ अंचल के लोग आज भी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से गहराई से जुड़े हुए हैं। विपरीत परिस्थितियों में भी सामूहिक विश्वास और परंपराओं के माध्यम से समाज एकजुट होकर बेहतर भविष्य की कामना करता है।