STVNEWS RAJASTHANअलवर से पूरे राजस्थान तकसोमवार, 2 नवंबर 2026LIVE TV

'CJP फिनिश!' काटजू का दावा: पीस बॉन्ड है माफीनामा, अब जेल जाना होगा; नेताओं की छवि धूमिल..

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू ने 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के नेताओं अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका द्वारा पीस बॉन्ड (शांति बंधपत्र) पर हस्ताक्षर करने की घटना पर कड़ी टिप्पणी की है। काटजू ने इसे एक सामान्य कानूनी प्रक्रिया के बजाय 'माफीनामा' के समान बताते हुए कहा कि इन नेताओं ने अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारी है। उनका मानना है कि किसी भी आंदोलनकारी या विपक्षी नेता के लिए शांति बनाए रखने का लिखित आश्वासन देना उसकी लड़ाई की ईमानदारी पर सवाल उठाता है।

काटजू का तीखा हमला: पीस बॉन्ड को बताया 'राजनीतिक आत्महत्या'
फोटो: STV NEWS RAJASTHAN

मुख्य बातें

  • काटजू का बड़ा दावा: पीस बॉन्ड है माफीनामा, CJP नेताओं का राजनीतिक अंत
  • 'CJP फिनिश': काटजू ने कहा- जेल के डर से झुके नेता, जनता का भरोसा टूटा
  • सीजेपी नेताओं पर काटजू की बरसात: पीस बॉन्ड ने बांधे हाथ, अब आंदोलन नामुमकिन

02-11-2026 दिल्ली:

काटजू का तीखा हमला: पीस बॉन्ड को बताया 'राजनीतिक आत्महत्या'

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू ने 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के नेताओं अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका द्वारा पीस बॉन्ड (शांति बंधपत्र) पर हस्ताक्षर करने की घटना पर कड़ी टिप्पणी की है। काटजू ने इसे एक सामान्य कानूनी प्रक्रिया के बजाय 'माफीनामा' के समान बताते हुए कहा कि इन नेताओं ने अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारी है। उनका मानना है कि किसी भी आंदोलनकारी या विपक्षी नेता के लिए शांति बनाए रखने का लिखित आश्वासन देना उसकी लड़ाई की ईमानदारी पर सवाल उठाता है। काटजू ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस कदम से सीजेपी नेताओं का राजनीतिक करियर लगभग समाप्त हो चुका है, क्योंकि जनता अब ऐसे नेताओं पर भरोसा नहीं करेगी जो दबाव पड़ने पर पीछे हट जाते हैं।

ऐतिहासिक तुलना: अंग्रेजी हुकूमत के 'माफीनामे' से जोड़ा मामला

अपने तर्क को मजबूती देने के लिए मार्कंडेय काटजू ने ब्रिटिश शासनकाल का ऐतिहासिक उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि उस समय अंग्रेज सरकार आजादी की लड़ाई लड़ने वाले क्रांतिकारियों को गिरफ्तार करती थी और उन्हें जेल से रिहा करने के लिए 'माफीनामा' लिखवाती थी। जो क्रांतिकारी यह माफीनामा लिखकर दे देते थे, उनकी जनता के बीच प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता पूरी तरह खत्म हो जाती थी। काटजू ने सीजेपी नेताओं की स्थिति की तुलना उसी दौर के उन क्रांतिकारियों से की, जिन्होंने संघर्ष छोड़ दिया था। उनका कहना है कि जिस प्रकार माफीनामा देने वालों को जनता ने ठुकरा दिया था, उसी प्रकार आज के युग में पीस बॉन्ड पर साइन करने वाले नेताओं की छवि 'कायर' या 'समझौतावादी' की बन गई है, जिससे उनका जनआधार कमजोर हुआ है।

कानूनी जाल: भविष्य के आंदोलनों पर लगी तलवार

पूर्व जज काटजू ने केवल नैतिक पहलू पर ही बात नहीं की, बल्कि इसके गंभीर कानूनी परिणामों की भी ओर इशारा किया। पीस बॉन्ड की शर्तों के तहत नेताओं ने अदालत के सामने शांति बनाए रखने और अच्छे व्यवहार का वादा किया है। काटजू का तर्क है कि अब यदि ये नेता किसी भी प्रकार के आंदोलन, प्रदर्शन या सार्वजनिक अवज्ञा में हिस्सा लेते हैं, तो पुलिस इसे सीधे 'शांति भंग करने की कोशिश' और बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन मानेगी। इसका मतलब यह है कि भविष्य में कोई भी छोटा-मोटा प्रदर्शन भी उनके लिए जेल जाने का कारण बन सकता है। इस कानूनी जाल ने उनके हाथ-पांव बांध दिए हैं, जिससे वे भविष्य में सक्रिय राजनीति या आंदोलन करने में असमर्थ महसूस करेंगे।

जेल का डर: रीढ़ की हड्डी टूटने का आरोप

काटजू ने दावा किया कि सीजेपी की 'रीढ़ की हड्डी टूट चुकी है' और पार्टी अब खत्म होने के कगार पर है। उन्होंने सौरव दास और आशुतोष रांका के हालिया अनुभव का जिक्र करते हुए कहा कि दोनों नेता पहले एक सप्ताह तक तिहाड़ जेल में बंद रहे थे। जेल के कठोर अनुभव और लंबी कानूनी लड़ाई के डर के कारण ही उन्होंने पीस बॉन्ड स्वीकार किया। काटजू का मानना है कि अब दोबारा आंदोलन करने पर उन्हें कई महीनों तक जेल में रहना पड़ सकता है, जिससे बचने के लिए ये नेता आंदोलन की रेखा से पीछे हट रहे हैं। यह डर उनकी राजनीतिक हिम्मत को कुंद कर रहा है, जिससे पार्टी के भीतर निराशा फैली है और कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरा है।

पृष्ठभूमि: CEC इस्तीफे के मुद्दे पर शुरू हुआ विवाद

इस पूरे विवाद की जड़ अक्टूबर महीने में हुई घटनाओं में है, जब CJP ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का ऐलान किया था। 10 अक्टूबर को दिल्ली पुलिस ने पार्टी के तीन प्रमुख नेताओं को हिरासत में लिया था। अगले दिन, 11 अक्टूबर को कार्यकारी मजिस्ट्रेट की अदालत ने उन्हें एक साल तक शांति बनाए रखने की शर्त पर 50-50 हजार रुपये के जमानती बॉन्ड पर रिहा किया था। हालांकि, 14 अक्टूबर को सौरव दास और आशुतोष रांका को फिर से हिरासत में लिया गया, क्योंकि उन पर प्रतिबंधों का उल्लंघन करने और बॉन्ड की शर्तें तोड़ने का आरोप लगा। बाद में लिखित आश्वासन के बाद उन्हें जमानत मिली, लेकिन इस घटनाक्रम ने पार्टी की कानूनी और राजनीतिक स्थिति को कमजोर कर दिया है।

पुलिस का पक्ष

इस पूरे विवाद की जड़ अक्टूबर महीने में हुई घटनाओं में है, जब CJP ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का ऐलान किया था। 10 अक्टूबर को दिल्ली पुलिस ने पार्टी के तीन प्रमुख नेताओं को हिरासत में लिया था। अगले दिन, 11 अक्टूबर को कार्यकारी मजिस्ट्रेट की अदालत ने उन्हें एक साल तक शांति बनाए रखने की शर्त पर 50-50 हजार रुपये के जमानती बॉन्ड पर रिहा किया था। हालांकि, 14 अक्टूबर को सौरव दास और आशुतोष रांका को फिर से हिरासत में लिया गया, क्योंकि उन पर प्रतिबंधों का उल्लंघन करने और बॉन्ड की शर्तें तोड़ने का आरोप लगा। बाद में लिखित आश्वासन के बाद उन्हें जमानत मिली, लेकिन इस घटनाक्रम ने पार्टी की कानूनी और राजनीतिक स्थिति को कमजोर कर दिया है।

इस खबर को शेयर करें

इस खबर में कोई गलती दिखी? हमें बताएं

Google पर STV की खबरें ज़्यादा देखें

STV को अपना पसंदीदा स्रोत चुनें।