चाइनीज लाइटों की चमक में फीकी पड़ रही मिट्टी के दीयों की रौनक, संकट में कुंभकारों का रोजगार
दीपावली नजदीक आते ही बाजार रंग-बिरंगी लाइटों और सजावटी सामानों से सजने लगे हैं। लेकिन आधुनिक सजावट के बढ़ते चलन के बीच मिट्टी के दीये बनाने वाले कुंभकारों का पारंपरिक कारोबार मुश्किलों का सामना कर रहा है। अलवर के राजगढ़ क्षेत्र में कुंभकार परिवार करीब छह महीने पहले से दीपावली की तैयारी में जुट जाते हैं। इसके बावजूद घटती मांग उनकी मेहनत और कमाई पर असर डाल रही है। कुम्हार ओमप्रकाश प्रजापत के अनुसार, पहले जैसी बिक्री नहीं होने से परिवारों के सामने आर्थिक चुनौतियां बढ़ रही हैं।

मुख्य बातें
- दीपावली पर मिट्टी के दीयों की मांग घटी, कुंभकारों की चिंता बढ़ी
- चाइनीज लाइटों के बीच संघर्ष कर रहे राजगढ़ के कुंभकार
- मिट्टी के दीयों का कारोबार कमजोर, कुंभकारों की आजीविका पर असर
ALWAR, 02 NOV. 2026:
1. बाजार में इलेक्ट्रॉनिक सजावट का बढ़ता आकर्षण
दीपावली का त्योहार आते ही बाजारों में रौनक बढ़ने लगती है। घरों और दुकानों को सजाने के लिए रंग-बिरंगी लाइटें, इलेक्ट्रॉनिक दीये और आकर्षक सजावटी सामान खरीदे जा रहे हैं। वहीं, मिट्टी के पारंपरिक दीयों की चमक कुछ कम होती दिखाई दे रही है। बाजार में मोमबत्तियों और पानी में तैरने वाले सजावटी दीयों जैसे विकल्प भी मौजूद हैं। बदलते दौर में ग्राहकों की पसंद में आए इस बदलाव का असर पारंपरिक मिट्टी के दीये बनाने वाले कारीगरों पर पड़ रहा है।
2. छह महीने पहले से शुरू होती है दीपावली की तैयारी
राजगढ़ क्षेत्र में कुंभकार परिवार दीपावली को ध्यान में रखते हुए महीनों पहले से दीये बनाने का काम शुरू कर देते हैं। मिट्टी तैयार करने से लेकर दीयों को आकार देने और सुखाने तक कई चरणों में मेहनत करनी पड़ती है। परिवार के सदस्य मिलकर हजारों दीये तैयार करते हैं। दीपावली का सीजन उनके लिए कमाई का अहम अवसर होता है। लेकिन मांग कम होने पर तैयार माल की बिक्री प्रभावित होती है। ऐसे में महीनों की मेहनत के बाद भी अपेक्षित आमदनी नहीं हो पाती।
3. पहले जैसी बिक्री नहीं, कारोबार पर आर्थिक दबाव
कुम्हार ओमप्रकाश प्रजापत का कहना है कि पहले दीपावली के दौरान मिट्टी के दीयों की अच्छी मांग रहती थी। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से बिक्री में कमी महसूस हो रही है। उनके अनुसार, छह महीने पहले से तैयारी करने के बावजूद अब पहले जैसा कारोबार नहीं होता। इससे पारंपरिक काम से जुड़े परिवारों की आर्थिक स्थिति पर असर पड़ रहा है। मिट्टी के दीये बनाना केवल एक मौसमी व्यवसाय नहीं, बल्कि कई परिवारों की पीढ़ियों से चली आ रही आजीविका भी है। घटती मांग उनके भविष्य को लेकर चिंता बढ़ा रही है।
4. आधुनिकता के बीच पारंपरिक कला बचाने की चुनौती
मिट्टी के दीये भारतीय त्योहारों और लोक परंपराओं से गहराई से जुड़े हैं। इनका निर्माण कारीगरों के हुनर और मेहनत का उदाहरण है। हालांकि, बाजार में नए विकल्प आने के साथ पारंपरिक उत्पादों को प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में मिट्टी के दीयों को बढ़ावा देने के लिए स्थानीय स्तर पर बिक्री के अवसर, उचित दाम और ग्राहकों तक बेहतर पहुंच महत्वपूर्ण हो सकती है। त्योहारों पर स्थानीय कारीगरों से दीये खरीदना उनके पारंपरिक रोजगार को सहारा देने का एक तरीका बन सकता है।
5. मिट्टी के दीये खरीदने से कारीगरों को मिल सकता है सहारा
दीपावली पर मिट्टी के दीये जलाने की परंपरा को आगे बढ़ाने के साथ स्थानीय कुंभकार परिवारों की मेहनत को भी महत्व दिया जा सकता है। बाजार से मिट्टी के दीये खरीदने पर सीधे कारीगरों को लाभ पहुंचने का अवसर मिलता है। ग्राहक दीये खरीदते समय उनकी गुणवत्ता और उचित कीमत का ध्यान रख सकते हैं। वहीं, स्थानीय बाजारों और मेलों में पारंपरिक उत्पादों को जगह मिलने से बिक्री के नए अवसर बन सकते हैं। आधुनिक सजावट के बीच मिट्टी के दीयों की पहचान बनाए रखना संस्कृति और स्थानीय रोजगार, दोनों के लिए अहम है।
इस खबर में कोई गलती दिखी? हमें बताएं





