Turkey Israel Tension: क्या पश्चिम एशिया में खुल सकता है नया मोर्चा? एर्दोगन के कदमों से बढ़ीं आशंकाएं
पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच तुर्की और इजरायल के संबंधों को लेकर नई चिंताएं सामने आई हैं। कुछ विशेषज्ञों और मीडिया रिपोर्टों का दावा है कि तुर्की की बढ़ती सैन्य तैयारियां और आपातकालीन शक्तियों का विस्तार भविष्य में क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ा सकता है। हालांकि, किसी संभावित युद्ध के प्रत्यक्ष प्रमाण अभी सामने नहीं आए हैं।
सैन्य तैयारियों को लेकर उठे सवाल
क्षेत्रीय मामलों पर नजर रखने वाले कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि तुर्की अपनी रक्षा क्षमताओं को तेजी से मजबूत कर रहा है। रिपोर्टों के मुताबिक, मिसाइल और ड्रोन कार्यक्रमों में तेजी, सेना के आधुनिकीकरण और आपातकालीन प्रावधानों के विस्तार को रणनीतिक तैयारी के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि अंकारा ने आधिकारिक तौर पर इजरायल को दुश्मन देश घोषित नहीं किया है, लेकिन दोनों देशों के बीच बढ़ती बयानबाजी ने नई चर्चाओं को जन्म दिया है।
निर्वासित पत्रकार के दावे चर्चा में
तुर्की के निर्वासित पत्रकार और नॉर्डिक मॉनिटर के संस्थापक अब्दुल्ला बोजकुर्ट ने दावा किया है कि राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन की सरकार ऐसे कदम उठा रही है, जो संभावित संकट की स्थिति में तेजी से संसाधन जुटाने में मदद करेंगे। उनके अनुसार, मई 2024 में लागू किए गए नियमों से सरकार को निजी संसाधनों और विशेष कौशल वाले नागरिकों को भी आपातकालीन जरूरतों के लिए उपयोग में लाने का अधिकार मिला है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनके पास किसी युद्ध की योजना के प्रत्यक्ष सबूत नहीं हैं।
सीरिया बन सकता है संभावित टकराव का केंद्र
विश्लेषकों का मानना है कि यदि भविष्य में तुर्की और इजरायल के बीच तनाव बढ़ता है तो सीरिया सबसे संवेदनशील क्षेत्र बन सकता है। दोनों देशों की गतिविधियां वहां अलग-अलग रणनीतिक हितों से जुड़ी हुई हैं और कई मामलों में उनके हित एक-दूसरे से टकराते हैं। ऐसे में किसी भी अप्रत्याशित घटना से क्षेत्रीय तनाव बढ़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
इजरायली विशेषज्ञों की अलग राय
इजरायल के कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि एर्दोगन सरकार के हालिया फैसलों का मुख्य उद्देश्य सेना पर राजनीतिक नियंत्रण मजबूत करना और भविष्य में किसी भी तख्तापलट जैसी स्थिति को रोकना है। उनके अनुसार, इन कदमों को केवल बाहरी खतरे से जोड़कर देखना उचित नहीं होगा। फिर भी पश्चिम एशिया की मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए विशेषज्ञ क्षेत्रीय घटनाक्रम पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।