आधुनिक भारत में दहेज का डरावना सच, हर दिन 16 महिलाओं की मौत ने खड़े किए बड़े सवाल
देश में शिक्षा, तकनीक और आधुनिक सोच की बात जरूर हो रही है, लेकिन दहेज प्रथा आज भी महिलाओं की जिंदगी पर भारी पड़ रही है। भोपाल की ट्विशा शर्मा, ग्रेटर नोएडा की दीपिका नागर और दिल्ली की SWAT कमांडो काजल चौधरी जैसी घटनाओं ने एक बार फिर समाज को झकझोर दिया है। पढ़ी-लिखी और आत्मनिर्भर महिलाएं भी कथित दहेज उत्पीड़न और घरेलू हिंसा से सुरक्षित नहीं हैं। NCRB के आंकड़े बताते हैं कि 2024 में देश में हर दिन औसतन 16 महिलाओं की मौत दहेज हिंसा के कारण हुई। यह केवल अपराध नहीं, बल्कि समाज की सोच और व्यवस्था पर बड़ा सवाल है।
ट्विशा और दीपिका केस ने फिर दिखाई समाज की कड़वी हकीकत
भोपाल की ट्विशा शर्मा और ग्रेटर नोएडा की दीपिका नागर की संदिग्ध मौत ने दहेज उत्पीड़न को लेकर नई बहस छेड़ दी है। दोनों मामलों में परिवारों ने दहेज प्रताड़ना और मानसिक दबाव के आरोप लगाए हैं। इससे पहले दिल्ली में गर्भवती SWAT कमांडो काजल चौधरी की हत्या ने भी पूरे देश को झकझोर दिया था। इन घटनाओं ने यह साफ कर दिया कि दहेज की समस्या केवल ग्रामीण या पिछड़े समाज तक सीमित नहीं है, बल्कि शिक्षित और शहरी वर्ग भी इसकी चपेट में है। आधुनिक जीवनशैली के बावजूद महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान आज भी बड़ी चुनौती बने हुए हैं।
NCRB रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की हालिया रिपोर्ट बेहद चिंताजनक तस्वीर पेश करती है। आंकड़ों के अनुसार, 2024 में दहेज हिंसा से हर दिन औसतन 16 महिलाओं की मौत हुई। दहेज हत्या के मामलों में दिल्ली लगातार महानगरों में शीर्ष पर रही, जबकि दहेज उत्पीड़न के सबसे ज्यादा केस उत्तर प्रदेश में दर्ज किए गए। इसके बाद बिहार और कर्नाटक का स्थान रहा। विशेषज्ञों का मानना है कि दहेज अब केवल आर्थिक लेन-देन नहीं रहा, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा, परिवार की छवि और महिलाओं पर नियंत्रण की मानसिकता से भी जुड़ गया है। यही वजह है कि यह कुरीति लगातार नए रूप में सामने आ रही है।
क्यों खत्म नहीं हो रही दहेज प्रथा?
दहेज को समाज में अक्सर ‘गिफ्ट’, ‘शगुन’ या ‘परंपरा’ का नाम देकर सामान्य बना दिया जाता है। यही इसकी सबसे बड़ी समस्या है। कानून होने के बावजूद लोग इसे सामाजिक प्रतिष्ठा का हिस्सा मानते हैं। कई मामलों में दहेज की मांग खुलकर नहीं, बल्कि अप्रत्यक्ष दबाव और अपेक्षाओं के रूप में सामने आती है। जब तक मामला हिंसा या मौत तक नहीं पहुंचता, तब तक समाज भी इसे गंभीरता से नहीं लेता। यही कारण है कि दहेज विरोधी कानून लागू होने के दशकों बाद भी यह समस्या खत्म होने के बजाय और जटिल होती जा रही है।
महिलाओं पर ‘शादी बचाने’ का दबाव
विशेषज्ञों का मानना है कि कई महिलाएं घरेलू हिंसा और दहेज प्रताड़ना सहने के बावजूद समय रहते शिकायत नहीं कर पातीं। इसकी सबसे बड़ी वजह परिवार, समाज और रिश्तों को बचाने का दबाव होता है। महिलाओं को अक्सर समझौता करने और ‘घर बचाने’ की सलाह दी जाती है। आर्थिक निर्भरता और सामाजिक बदनामी का डर भी उन्हें चुप रहने पर मजबूर करता है। यही चुप्पी कई बार बड़ी त्रासदी में बदल जाती है। ऐसे में केवल कानून काफी नहीं, बल्कि सामाजिक समर्थन और सुरक्षित शिकायत तंत्र भी जरूरी है।
सोच बदलने के बिना नहीं बदलेगी तस्वीर
दहेज की समस्या केवल कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक मानसिकता से जुड़ा मुद्दा है। जब तक विवाह को लेन-देन और सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा जाएगा, तब तक बदलाव अधूरा रहेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता, परिवारों में समानता की सोच और बेटियों को बोझ नहीं बल्कि अधिकार समझने की मानसिकता विकसित करना बेहद जरूरी है। समाज में वास्तविक बदलाव तभी आएगा, जब दहेज लेने और देने दोनों को सामाजिक रूप से अस्वीकार्य माना जाएगा। वरना कानून होने के बावजूद बेटियों की जान जाती रहेगी।