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संसद में डीलिमिटेशन बिल पर टकराव तय: सीटें बढ़ाने और महिला आरक्षण को लेकर सियासी संग्राम तेज

केंद्र सरकार आज संसद में डीलिमिटेशन (परिसीमन) से जुड़ा अहम विधेयक पेश करने जा रही है, जिसने पहले ही देश की राजनीति में हलचल मचा दी है। लोकसभा सीटों को 543 से बढ़ाकर 850 करने और एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने के प्रस्ताव पर सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने हैं। जहां सरकार इसे प्रतिनिधित्व बढ़ाने और महिला सशक्तिकरण की दिशा में बड़ा कदम बता रही है, वहीं विपक्ष इसे राजनीतिक लाभ के लिए उठाया गया कदम करार दे रहा है।

डीलिमिटेशन बिल: क्या हैं प्रमुख प्रस्ताव

सरकार द्वारा प्रस्तावित डीलिमिटेशन बिल में लोकसभा सीटों की संख्या को मौजूदा 543 से बढ़ाकर 850 करने की बात कही गई है। इसके साथ ही लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रावधान भी शामिल है। यह आरक्षण 2023 में पारित कानून के अनुरूप होगा, लेकिन इसे लागू करने के लिए नई जनगणना और परिसीमन प्रक्रिया पूरी करना जरूरी होगा। यानी पहले सीटों का पुनर्गठन होगा और फिर आरक्षण लागू किया जाएगा।

महिला आरक्षण और परिसीमन का संबंध

महिला आरक्षण को लागू करने की प्रक्रिया सीधे तौर पर परिसीमन से जुड़ी हुई है। 2023 में पारित नारी शक्ति वंदन कानून में स्पष्ट किया गया था कि महिलाओं को 33% आरक्षण तभी मिलेगा जब देश में नई जनगणना के बाद सीटों का पुनर्निर्धारण किया जाएगा। इस प्रस्ताव के तहत सीटों की संख्या बढ़ने के बाद ही महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें तय होंगी। सरकार का दावा है कि इससे संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी ऐतिहासिक रूप से बढ़ेगी।

विपक्ष का आरोप: ‘हिस्सा चोरी’ और राजनीतिक ला

कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इस बिल को लेकर लगातार सवाल उठा रहे हैं। उनका आरोप है कि परिसीमन के जरिए उन राज्यों में सीटें बढ़ाई जाएंगी जहां जनसंख्या अधिक है, खासकर उत्तर भारत में। इससे दक्षिण भारतीय राज्यों का संसद में प्रतिनिधित्व अपेक्षाकृत कम हो सकता है। विपक्ष का कहना है कि यह “हिस्सा चोरी” जैसा कदम है, जिससे क्षेत्रीय संतुलन बिगड़ सकता है और सत्तारूढ़ दल को चुनावी लाभ मिल सकता है।

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