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अमेरिका पर नरम रुख को लेकर उठे सवाल, पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल बोले- हम बचाव क्यों कर रहे हैं?

होर्मुज स्ट्रेट और ओमान की खाड़ी में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के दौरान तीन भारतीय नाविकों की मौत के बाद भारत की प्रतिक्रिया पर बहस तेज हो गई है। कई पूर्व राजनयिकों, सामरिक विशेषज्ञों और विश्लेषकों ने सवाल उठाया है कि आखिर भारत अमेरिका का नाम लेने से क्यों बच रहा है। पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने भी सरकार के रुख पर चिंता जताते हुए पूछा है कि क्या भारत अनजाने में अमेरिकी कार्रवाई का बचाव कर रहा है।

तीन भारतीय नाविकों की मौत के बाद बढ़ी चिंता

पश्चिम एशिया में ईरान के खिलाफ अमेरिका के नाकेबंदी अभियान के दौरान भारतीय चालक दल वाले जहाजों को निशाना बनाए जाने की घटनाओं ने नई चिंता पैदा कर दी है। एक तेल टैंकर पर हुए हमले में तीन भारतीय नाविकों की मौत हो गई, जबकि अन्य जहाजों पर मौजूद भारतीयों को सुरक्षित निकाल लिया गया। केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने तीनों लापता नाविकों की मौत की पुष्टि की। इस घटना के बाद भारत ने अमेरिकी दूतावास के एक वरिष्ठ अधिकारी को तलब कर विरोध दर्ज कराया, लेकिन सरकार की प्रतिक्रिया को लेकर कई विशेषज्ञों ने सवाल खड़े किए हैं।

कंवल सिब्बल का सवाल- अमेरिकी तर्कों को सही क्यों ठहरा रहे हैं?

पूर्व विदेश सचिव और रूस में भारत के पूर्व राजदूत कंवल सिब्बल ने कहा कि “प्रतिबंध” और “नॉन-कंप्लायंस” जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर भारत अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिकी कार्रवाई को वैधता देता दिखाई दे रहा है। उन्होंने कहा कि चाहे जहाज भारतीय ध्वज वाले न हों, लेकिन भारतीय नागरिकों की मौत सबसे बड़ी चिंता का विषय है। सिब्बल ने यह भी कहा कि अमेरिकी सेंट्रल कमांड की ओर से अब तक न तो कोई सार्वजनिक खेद व्यक्त किया गया और न ही मृतकों के परिवारों के प्रति संवेदना जताई गई, जो चिंताजनक है।

विश्लेषकों ने भारत की कूटनीतिक भाषा पर उठाए सवाल

कई सामरिक विशेषज्ञों और वरिष्ठ पत्रकारों ने भारत के आधिकारिक बयान में अमेरिका का नाम नहीं लेने पर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि यदि भारतीय नागरिकों की जान गई है, तो जिम्मेदार पक्ष का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि भारत विभिन्न वैश्विक मुद्दों पर संतुलित भाषा अपनाता रहा है, लेकिन अपने नागरिकों की मौत के मामले में अत्यधिक सतर्क रुख सवालों को जन्म देता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह मामला केवल कूटनीति नहीं बल्कि भारतीय नागरिकों की सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है।

ब्रह्मा चेलानी बोले- अगर अमेरिकी नागरिक मारे जाते तो क्या होता?

सामरिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी ने इस घटना की तुलना अमेरिका की संभावित प्रतिक्रिया से करते हुए कहा कि यदि किसी हमले में अमेरिकी नागरिकों की मौत होती, तो वहां बड़ा राजनीतिक संकट खड़ा हो जाता। उन्होंने कहा कि भारतीय नाविकों की मौत के बावजूद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपेक्षित प्रतिक्रिया नहीं दिखाई दी। चेलानी ने यह भी कहा कि यह सप्ताह में तीसरा मामला था, जब भारतीय चालक दल वाले जहाज अमेरिकी कार्रवाई की चपेट में आए।

भारत ने क्या कहा और अमेरिका का क्या है पक्ष?

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत के लिए समुद्री व्यापार की सुरक्षा बेहद महत्वपूर्ण है और ऐसे हमले बंद होने चाहिए। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जिन जहाजों को निशाना बनाया गया, वे भारतीय स्वामित्व वाले नहीं थे। दूसरी ओर अमेरिकी सेंट्रल कमांड का कहना है कि संबंधित जहाजों ने बार-बार दी गई चेतावनियों का पालन नहीं किया और नाकेबंदी के नियमों का उल्लंघन किया था। अमेरिका के अनुसार, अप्रैल में अभियान शुरू होने के बाद अब तक कई जहाजों का रास्ता बदला गया है और कुछ को निष्क्रिय भी किया गया है।

अंतरराष्ट्रीय कानून और समुद्री स्वतंत्रता पर नई बहस

विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में व्यापारिक जहाजों पर सैन्य कार्रवाई ने समुद्री स्वतंत्रता और अंतरराष्ट्रीय कानून को लेकर नई बहस छेड़ दी है। कई विश्लेषकों का कहना है कि खुले समुद्र में नौवहन की स्वतंत्रता अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का मूल सिद्धांत है और किसी भी कार्रवाई का असर वैश्विक व्यापार और क्षेत्रीय स्थिरता पर पड़ सकता है। इस पूरे घटनाक्रम ने भारत-अमेरिका संबंधों, क्वॉड सहयोग और रणनीतिक प्राथमिकताओं को लेकर भी नई चर्चा को जन्म दिया है।

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