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अलवर में आरक्षण की नई तस्वीर से बदले सियासी समीकरण, अब ‘श्रीमती जी’ पर दांव!


अलवर जिले में निकाय और पंचायती राज चुनावों को लेकर आरक्षण की नई तस्वीर सामने आने के बाद राजनीतिक हलकों में हलचल तेज हो गई है। नगर निगम और जिला परिषद के शीर्ष पद महिलाओं के लिए आरक्षित होने से कई दावेदारों की उम्मीदों को झटका लगा है। हालांकि, सियासी मैदान में मायूसी के बजाय नई रणनीति तैयार होने लगी है। जिन नेताओं की नजर मेयर या जिला प्रमुख की कुर्सी पर थी, वे अब अपनी पत्नी को चुनाव मैदान में उतारने की तैयारी में जुट गए हैं। जिले के 12 निकायों में से 8 में इस बार महिला नेतृत्व की संभावना बनी है। ऐसे में आने वाले चुनावों में महिला प्रत्याशियों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रहने वाली है।

अलवर में फिर दिखेगा महिला नेतृत्व का असर

अलवर में महिला नेतृत्व की राजनीतिक मौजूदगी कोई नई बात नहीं है। पिछले करीब ढाई दशकों के दौरान नगर निकाय और जिला परिषद के शीर्ष पदों पर महिलाओं की मजबूत भागीदारी रही है। नगर परिषद से नगर निगम बनने तक अलग-अलग दौर में महिला चेयरमैन और जिला प्रमुख जिले की राजनीति का नेतृत्व करती रही हैं। अब आरक्षण व्यवस्था के तहत नगर निगम के मेयर और जिला परिषद के जिला प्रमुख पद महिलाओं के लिए आरक्षित होने से यह परंपरा आगे बढ़ती दिखाई दे रही है। इससे महिला राजनीतिक दावेदारों के लिए अवसर बढ़े हैं और प्रमुख राजनीतिक दलों के भीतर टिकट को लेकर नए समीकरण बनने लगे हैं।

12 में से 8 निकायों में महिलाओं को नेतृत्व का मौका

आरक्षण की नई व्यवस्था के मुताबिक अलवर जिले के 12 निकायों में से 8 निकायों में इस बार महिला नेतृत्व की संभावना है। इसके साथ ही नगर निगम के मेयर पद को भी महिला वर्ग के लिए आरक्षित किया गया है। इस बदलाव ने चुनावी रणनीति को पूरी तरह प्रभावित किया है। भाजपा और कांग्रेस समेत प्रमुख राजनीतिक दलों में अब महिला प्रत्याशियों के नामों पर मंथन तेज होने की उम्मीद है। कई राजनीतिक परिवारों में भी संभावित महिला उम्मीदवारों को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। हालांकि अंतिम तस्वीर टिकट वितरण और चुनावी प्रक्रिया आगे बढ़ने के बाद ही साफ होगी।

जिला प्रमुख पद पर भी महिलाओं का लंबा इतिहास

अलवर जिला परिषद में महिला नेतृत्व का पुराना इतिहास रहा है। वर्ष 2000 में भाजपा की डॉ. किरण यादव जिला प्रमुख बनी थीं। इसके बाद वर्ष 2010 में कांग्रेस की सफिया खान ने जिला प्रमुख की जिम्मेदारी संभाली। वर्ष 2015 में कांग्रेस की रेखा यादव जिला प्रमुख बनीं। इन उदाहरणों से साफ है कि अलवर की जिला परिषद में महिला नेतृत्व पहले भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। अब जिला प्रमुख पद महिलाओं के लिए आरक्षित होने के बाद राजनीतिक दलों के सामने महिला चेहरों का चयन बड़ी चुनौती होगा। संभावित दावेदारों को लेकर स्थानीय स्तर पर राजनीतिक गतिविधियां बढ़ने लगी हैं।

दिग्गजों की रणनीति बदली, पत्नियों पर दांव की तैयारी

आरक्षण की लॉटरी ने उन नेताओं की चुनावी रणनीति बदल दी है, जो खुद मेयर या जिला प्रमुख बनने की तैयारी कर रहे थे। पद महिला वर्ग के लिए आरक्षित होने के बाद अब कई दिग्गज नेता अपनी पत्नी को चुनाव मैदान में उतारने की रणनीति बना सकते हैं। राजनीतिक गलियारों में इसे लेकर चर्चाएं तेज हैं। हालांकि किसी भी नेता या परिवार की उम्मीदवारी को अंतिम नहीं माना जा सकता, क्योंकि टिकट का फैसला संबंधित राजनीतिक दलों और चुनावी परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। इसके बावजूद आरक्षण के बाद परिवार आधारित राजनीतिक समीकरण और संभावित महिला प्रत्याशियों की तलाश चर्चा का प्रमुख विषय बन गई है।

17 अगस्त को तय होगा जिला पार्षदों के वार्डों का आरक्षण

पंचायत चुनाव की तस्वीर अभी पूरी तरह साफ नहीं हुई है। पंचायत समितियों के प्रधान और जिला परिषद के जिला पार्षदों के वार्डों का आरक्षण 17 अगस्त को निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार किया जाएगा। इसके लिए दोपहर 2 बजे मिनी सचिवालय सभागार में लॉटरी प्रक्रिया प्रस्तावित है। वार्डों के आरक्षण के बाद ही कई नेताओं और संभावित प्रत्याशियों की चुनावी स्थिति स्पष्ट होगी। इसके बाद संबंधित क्षेत्रों में राजनीतिक गतिविधियां और तेज होने की संभावना है। दावेदार अपने-अपने क्षेत्र में समीकरण साधने और पार्टी स्तर पर टिकट के लिए मजबूत दावेदारी पेश करने की तैयारी कर रहे हैं।

सरपंच और वार्ड पंचों का आरक्षण 18 अगस्त को

ग्राम पंचायत स्तर पर भी आरक्षण की प्रक्रिया जल्द पूरी होगी। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार सरपंच और वार्ड पंच पदों के आरक्षण का निर्धारण संबंधित उपखंड अधिकारियों की ओर से 18 अगस्त को किया जाएगा। इस प्रक्रिया के बाद गांवों में भी चुनावी समीकरण तेजी से बदल सकते हैं। आरक्षण की स्थिति सामने आने के साथ संभावित उम्मीदवार अपने राजनीतिक समीकरणों का आकलन करेंगे। पंचायत से लेकर जिला स्तर तक आरक्षण की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही चुनावी तस्वीर अधिक स्पष्ट होगी। फिलहाल अलवर में राजनीतिक दलों के साथ-साथ संभावित प्रत्याशियों की नजर आगामी आरक्षण प्रक्रियाओं पर टिकी हुई है।

महिला आरक्षण से बढ़ेगी राजनीतिक भागीदारी

अलवर में शीर्ष पदों पर महिला आरक्षण से महिला राजनीतिक भागीदारी को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। हालांकि चुनावी मैदान में उतरने वाली प्रत्येक महिला उम्मीदवार की अपनी राजनीतिक पहचान, संगठनात्मक पकड़ और स्थानीय जनसमर्थन महत्वपूर्ण होगा। केवल आरक्षण के आधार पर चुनावी जीत तय नहीं होती। आने वाले दिनों में भाजपा और कांग्रेस सहित अन्य दलों की ओर से प्रत्याशियों के चयन के बाद तस्वीर और स्पष्ट होगी। फिलहाल आरक्षण ने इतना जरूर तय कर दिया है कि अलवर की स्थानीय राजनीति में महिलाओं की भूमिका इस चुनाव में पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण रहने वाली है।

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