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भारत-पाक ने निभाई परमाणु समझौते की परंपरा, 35वीं बार साझा हुई न्यूक्लियर ठिकानों की सूची


नए साल के पहले दिन भारत और पाकिस्तान ने एक बार फिर परमाणु क्षेत्र में जिम्मेदारी का संकेत देते हुए अपने-अपने परमाणु प्रतिष्ठानों और सुविधाओं की सूची का आदान-प्रदान किया। दशकों से चले आ रहे तनावपूर्ण रिश्तों के बावजूद यह प्रक्रिया लगातार जारी रहना, दोनों देशों के बीच परमाणु संतुलन और न्यूनतम भरोसे की अहम मिसाल मानी जाती है।


🔹 हर साल 1 जनवरी को निभाई जाती है यह परमाणु परंपरा

भारत और पाकिस्तान ने एक साथ नई दिल्ली और इस्लामाबाद में परमाणु प्रतिष्ठानों की सूची साझा की। विदेश मंत्रालय के अनुसार यह 35वां लगातार साल है जब दोनों देशों ने यह जानकारी एक-दूसरे को सौंपी। पहली बार यह अदला-बदली 1 जनवरी 1992 को की गई थी और तब से यह प्रक्रिया बिना रुके जारी है।


🔹 किस समझौते के तहत होती है यह अदला-बदली

यह प्रक्रिया परमाणु प्रतिष्ठानों और सुविधाओं पर हमले के निषेध संबंधी समझौते के तहत होती है। यह समझौता 31 दिसंबर 1988 को हुआ था और 27 जनवरी 1991 से प्रभावी हुआ। इसके तहत दोनों देश एक-दूसरे के परमाणु ठिकानों को नुकसान पहुंचाने, नष्ट करने या ऐसी किसी कार्रवाई के लिए उकसाने से बचने के लिए बाध्य हैं।


🔹 किन-किन परमाणु सुविधाओं की दी जाती है जानकारी

इस समझौते के अंतर्गत परमाणु बिजली संयंत्र, शोध रिएक्टर, यूरेनियम संवर्धन केंद्र, ईंधन निर्माण इकाइयां और रेडियोधर्मी सामग्री के भंडारण स्थल शामिल हैं। दोनों देशों को हर साल इन ठिकानों की भौगोलिक स्थिति (अक्षांश-देशांतर सहित) साझा करनी होती है।


🔹 युद्ध और तनाव के दौर में भी नहीं टूटी कड़ी

विशेषज्ञों के अनुसार यह व्यवस्था भारत-पाकिस्तान जैसे दो परमाणु संपन्न देशों के बीच जोखिम कम करने का महत्वपूर्ण माध्यम है। कारगिल युद्ध, 2001-02 सैन्य तनाव, उरी हमला, पुलवामा-बालाकोट घटनाक्रम और हालिया सैन्य अभियानों के बावजूद यह प्रक्रिया कभी नहीं रुकी।


🔹 परमाणु हथियारों को नहीं, ठिकानों को कवर करता है समझौता

यह समझौता केवल परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमले को रोकता है, न कि परमाणु हथियारों के विकास या तैनाती को। इसमें किसी प्रकार की जांच या सत्यापन प्रणाली भी नहीं है। इसके बावजूद दोनों देशों द्वारा लगातार पालन यह दर्शाता है कि परमाणु ढांचे की संवेदनशीलता को लेकर एक न्यूनतम साझा समझ मौजूद है।


🔹 क्यों अहम है यह प्रक्रिया:

रणनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि किसी भी युद्ध या संकट की स्थिति में परमाणु ठिकानों पर हमला विनाशकारी मानवीय और पर्यावरणीय परिणाम ला सकता है। ऐसे में यह समझौता एक रिस्क-रिडक्शन मैकेनिज्म के रूप में काम करता है। हालांकि पाकिस्तान के परमाणु हथियारों की सुरक्षा को लेकर समय-समय पर उठने वाली चिंताएं इस व्यवस्था की सीमाओं की ओर भी इशारा करती हैं।


लगातार तनाव के बीच भी परमाणु सूचनाओं की यह अदला-बदली यह साबित करती है कि दोनों देश परमाणु युद्ध के खतरे को समझते हैं। यह समझौता भले ही सीमित हो, लेकिन दक्षिण एशिया में परमाणु स्थिरता बनाए रखने की दिशा में इसे एक अहम कदम माना जाता है।

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