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नॉर्मल डिलीवरी को पीछे छोड़ गया C-Section: बदलता मातृत्व, इंग्लैंड के बाद भारत के आंकड़े भी चिंता बढ़ाने वाले…..

मां बनना हमेशा से जीवन का सबसे भावनात्मक और स्वाभाविक अनुभव माना जाता रहा है, लेकिन अब प्रसव की प्रक्रिया तेजी से बदलती दिख रही है। पहली बार किसी विकसित देश में ऐसा हुआ है, जब ऑपरेशन से होने वाली डिलीवरी यानी सी-सेक्शन (C-Section) ने नॉर्मल डिलीवरी को पीछे छोड़ दिया है। इंग्लैंड से सामने आए नए आंकड़ों ने न केवल चिकित्सा जगत बल्कि समाज को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है।

इंग्लैंड में पहली बार नॉर्मल डिलीवरी से ज्यादा C-Section

इंग्लैंड की राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा (NHS) के हालिया आंकड़ों के अनुसार, पिछले वर्ष देश में लगभग 45% शिशुओं का जन्म सी-सेक्शन के जरिए हुआ, जबकि करीब 44% बच्चों का जन्म नॉर्मल डिलीवरी से हुआ। इसके अलावा लगभग 11% मामलों में फोर्सेप्स या वैक्यूम जैसे उपकरणों की सहायता से प्रसव कराया गया। यह पहला अवसर है जब इंग्लैंड में ऑपरेशन आधारित प्रसव का आंकड़ा सामान्य प्रसव से अधिक दर्ज किया गया।

आखिर क्यों बढ़ रहा है C-Section का चलन?

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक, सी-सेक्शन बढ़ने के पीछे कई कारण जिम्मेदार हैं। महिलाओं में मातृत्व की उम्र बढ़ना, हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, जटिल गर्भावस्था, पहले से सी-सेक्शन का इतिहास और अस्पताल आधारित निगरानी जैसे कारक इसमें प्रमुख हैं।
इसके साथ ही कई मामलों में महिलाएं खुद भी दर्द, समय और सुविधा को देखते हुए सी-सेक्शन को प्राथमिकता देने लगी हैं। डॉक्टरों और अस्पतालों पर भी कानूनी जोखिम और समय प्रबंधन का दबाव असर डालता है।

भारत में भी तेजी से बदल रही तस्वीर

इंग्लैंड का यह ट्रेंड भारत के लिए भी एक चेतावनी की तरह है। भारत में वर्तमान में औसतन 20 से 22 प्रतिशत डिलीवरी सी-सेक्शन के जरिए हो रही हैं। यानी हर पांच में से कम से कम एक महिला ऑपरेशन से बच्चे को जन्म दे रही है।
हालांकि यह राष्ट्रीय औसत है — राज्यों और क्षेत्रों के बीच इसमें भारी अंतर देखने को मिलता है।

सरकारी और निजी अस्पतालों में बड़ा अंतर

कुछ राज्यों में सी-सेक्शन दर 10% से भी कम है, जबकि दक्षिण भारत के कुछ राज्यों और बड़े शहरों के निजी अस्पतालों में यह दर 60% से ज्यादा तक पहुंच चुकी है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि निजी अस्पतालों में सुविधा, समय नियंत्रण और व्यावसायिक दबाव के चलते ऑपरेटिव डिलीवरी की संख्या अधिक रहती है।

WHO क्यों जता रहा चिंता?

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, किसी भी देश में 10–15% तक की सी-सेक्शन दर चिकित्सकीय रूप से संतुलित मानी जाती है। इससे अधिक दर यह संकेत देती है कि कहीं न कहीं अनावश्यक सर्जरी हो रही है।
सी-सेक्शन जरूरत पड़ने पर जीवन रक्षक प्रक्रिया है, लेकिन अनावश्यक होने पर यह मां और बच्चे दोनों के लिए जोखिम बढ़ा सकती है।

नॉर्मल डिलीवरी बनाम C-Section

विशेषज्ञ बताते हैं कि नॉर्मल डिलीवरी में मां की रिकवरी तेज होती है, खर्च कम होता है और मां-बच्चे का शुरुआती संपर्क बेहतर होता है। वहीं सी-सेक्शन में सर्जिकल जोखिम, लंबा रिकवरी समय और अगली प्रेग्नेंसी में जटिलताओं की संभावना बढ़ जाती है।

बदलता मातृत्व, बढ़ती जिम्मेदारी

बढ़ते सी-सेक्शन आंकड़े यह दिखाते हैं कि प्रसव अब सिर्फ जैविक प्रक्रिया नहीं, बल्कि जीवनशैली, चिकित्सा व्यवस्था और सामाजिक दबावों का मिश्रण बन चुका है।
विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि डिलीवरी का तरीका सुविधा या प्रवृत्ति नहीं, बल्कि मां और बच्चे की सुरक्षा के वैज्ञानिक मूल्यांकन पर आधारित होना चाहिए।

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