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राजस्थान यूथ कांग्रेस का ‘ताज’ किसे? अभिषेक vs अनिल की जंग में सियासी शतरंज तेज

राजस्थान यूथ कांग्रेस अध्यक्ष पद की दौड़ अब दिलचस्प मोड़ पर आ चुकी है। 22 दावेदारों की भीड़ छंटकर मुकाबला लगभग दो से तीन नामों तक आ गया है इसमें भी मुख्य तौर पर—अभिषेक चौधरी और अनिल चोपड़ा—के बीच टक्कर दिखाई दे रही है । लेकिन यह सीधी रेस जितनी दिखती है, उतनी आसान है नहीं; अंदरखाने गुटबाजी, समीकरण और दिल्ली दरबार का इंटरव्यू—सब मिलकर इसे सियासी ‘रियलिटी शो’ बना रहे हैं।

दो चेहरे, एक कुर्सी… इसमें मुकाबला बड़ा दिलचस्प होता जा रहा है

माना जा रहा है राजस्थान युवा कांग्रेस की कमान की लड़ाई अभिषेक चौधरी और अनिल चोपड़ा के बीच अब सीधी जा रही है। नामांकन प्रक्रिया पूरी होने के बाद बाकी दावेदारों की मौजूदगी सिर्फ औपचारिक लग रही है। खास बात यह कि मुकुल खींचड़ के मैदान में न उतरने से मुकाबला और भी ‘टू-हॉर्स रेस’ बन गया है। दोनों ही उम्मीदवार अपनी-अपनी राजनीतिक जमीन पर मजबूत पकड़ रखते हैं, लेकिन असली खेल अभी बाकी है।

चुनावी ट्रैक रिकॉर्ड: हार में भी ‘हीरो’ बनने की कोशिश

अनिल चोपड़ा ने 2024 के लोकसभा चुनाव में जयपुर ग्रामीण सीट से बेहद मामूली अंतर से हार झेली थी—बस 1615 वोट! यानी हारकर भी चर्चा में रहे।
वहीं अभिषेक चौधरी ने 2023 के विधानसभा चुनाव में झोटवाड़ा से मजबूत लड़ाई लड़ी और करीब 96 हजार वोट हासिल कर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। साफ है, दोनों ही नेता हार को भी ‘राजनीतिक निवेश’ की तरह भुनाना जानते हैं।

छात्र राजनीति से सत्ता के गलियारे तक

अभिषेक चौधरी का राजनीतिक सफर छात्रसंघ अध्यक्ष से शुरू होकर NSUI के प्रदेश अध्यक्ष तक पहुंचा।
दूसरी ओर, अनिल चोपड़ा भी छात्र राजनीति के ‘पुराने खिलाड़ी’ हैं—राजस्थान विश्वविद्यालय छात्रसंघ अध्यक्ष से लेकर NSUI के राष्ट्रीय सचिव तक का सफर तय कर चुके हैं।
यानी दोनों के पास ‘युवा राजनीति’ का सर्टिफिकेट तो पक्का है, अब बारी है ‘ताज’ की।

गुटबाजी: असली खेल पर्दे के पीछे

राजनीति में सिर्फ लोकप्रियता ही नहीं, ‘किसके साथ खड़े हो’ यह भी बहुत मायने रखता है।
अभिषेक चौधरी को अशोक गहलोत और गोविंद सिंह डोटासरा खेमे का समर्थन माना जा रहा है।
वहीं अनिल चोपड़ा को सचिन पायलट गुट का करीबी बताया जा रहा है।

राजनीतिक जानकारों की मानें तो यूथ कांग्रेस में पायलट खेमे का प्रभाव पहले से मजबूत रहा है, जिससे अनिल को ‘इनविजिबल बोनस’ मिल सकता है। लेकिन अभिषेक के पास भी संगठनात्मक ताकत है—500+ ब्लॉक जोड़ने का दावा उनके पक्ष में जाता है, जबकि अनिल करीब 350 ब्लॉक तक ही पहुंच पाए हैं।

दिल्ली दरबार का ‘फाइनल एपिसोड’ बाकी

अभी यह सियासी कहानी खत्म नहीं हुई है। सदस्यता अभियान और वोटिंग के बाद टॉप-3 उम्मीदवारों को दिल्ली बुलाया जाएगा, जहां इंटरव्यू होगा।
यानी अंतिम फैसला न तो सिर्फ वोट तय करेंगे और न ही सिर्फ लोकप्रियता—‘दिल्ली की मंजूरी’ ही असली चाबी है।

निष्कर्ष: ताज किसे मिलेगा?

फिलहाल तस्वीर धुंधली है—एक तरफ संगठन मजबूत करने वाले अभिषेक, तो दूसरी तरफ गुटीय समर्थन में आगे दिख रहे अनिल।
सीधे शब्दों में कहें तो यह मुकाबला अब सिर्फ वोटों का नहीं, बल्कि ‘नेटवर्क vs सपोर्ट सिस्टम’ का बन चुका है।

और राजनीति के इस खेल में एक बात तो तय है—
ताज उसी के सिर सजेगा, जो दिल्ली और राजस्थान दोनों को साथ लेकर चले… वरना अच्छे-अच्छों की बाज़ी
आखिरी मोड़ पर भी पलट जाती है।

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