रूसी तेल खरीद पर अमेरिका में सख्ती की तैयारी, भारत समेत बड़े खरीदार देशों पर 100% टैरिफ वाले विधेयक को मिला व्यापक समर्थन
अमेरिकी सीनेट में रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर कड़े आर्थिक कदम उठाने की दिशा में एक नया विधेयक चर्चा में है। इस प्रस्तावित बिल को 60 सीनेटरों का समर्थन मिलने की खबर है। विधेयक में भारत, चीन, हंगरी, अजरबैजान और अन्य बड़े खरीदार देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का प्रावधान रखा गया है। हालांकि यह अभी केवल प्रस्तावित कानून है और इसके लागू होने से पहले अमेरिकी संसद की दोनों सदनों से मंजूरी तथा राष्ट्रपति के हस्ताक्षर आवश्यक होंगे।
क्या है प्रस्तावित विधेयक और इसका उद्देश्य?
अमेरिकी सीनेट में पेश किए गए संशोधित विधेयक का उद्देश्य रूस के ऊर्जा निर्यात से होने वाली आय को सीमित करना बताया गया है। प्रारंभिक प्रस्ताव में रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 500% टैरिफ लगाने की बात थी, जिसे संशोधित कर 100% तक कर दिया गया है। विधेयक के समर्थकों का तर्क है कि इससे रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ेगा और यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में उसकी वित्तीय क्षमता प्रभावित होगी। फिलहाल यह एक विधायी प्रस्ताव है, जिसे कानून बनने के लिए आगे कई संसदीय चरणों से गुजरना होगा।
भारत क्यों है चर्चा के केंद्र में?
भारत रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले प्रमुख देशों में शामिल है। वर्ष 2022 के बाद पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच भारत ने रियायती दरों पर रूसी तेल का आयात बढ़ाया था। भारत का कहना रहा है कि उसकी प्राथमिकता ऊर्जा सुरक्षा, सस्ती ईंधन आपूर्ति और घरेलू आर्थिक स्थिरता बनाए रखना है। प्रस्तावित अमेरिकी विधेयक में भारत का नाम प्रमुख खरीदार देशों में शामिल होने के कारण नई दिल्ली की चिंता बढ़ी है। हालांकि, अभी तक यह प्रस्ताव लागू नहीं हुआ है और भारत सरकार की ओर से इस पर कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सार्वजनिक नहीं की गई है।
यूरोपीय देशों को छूट पर उठे सवाल
प्रस्तावित विधेयक में कुछ यूरोपीय देशों के लिए विशेष प्रावधान रखा गया है। रिपोर्टों के अनुसार, वे देश जो रूस से सीमित मात्रा में प्राकृतिक गैस आयात करते हैं और अपनी निर्भरता कम करने की दिशा में कदम उठा रहे हैं, उन्हें राहत मिल सकती है। इसी बिंदु को लेकर आलोचना भी हो रही है। कुछ विश्लेषकों और भारतीय पक्ष के अधिकारियों का मानना है कि यदि कुछ सहयोगी देशों को छूट दी जाती है, जबकि अन्य देशों पर कठोर आर्थिक कदम प्रस्तावित किए जाते हैं, तो इससे समान नीति अपनाने पर सवाल खड़े हो सकते हैं।
भारत की ऊर्जा रणनीति क्या है?
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की आवश्यकता का अधिकांश हिस्सा आयात करता है। विशेषज्ञों के अनुसार, रूसी कच्चे तेल को प्रोसेस करने के लिए भारतीय रिफाइनरियों ने पिछले कुछ वर्षों में तकनीकी निवेश भी किया है। इसके चलते कई रिफाइनरियां रूसी ग्रेड के तेल के अनुरूप अपने संयंत्रों को अनुकूलित कर चुकी हैं। भारत लगातार यह कहता रहा है कि ऊर्जा खरीद उसके राष्ट्रीय हित और बाजार परिस्थितियों के आधार पर तय होती है तथा उसका उद्देश्य नागरिकों को किफायती ऊर्जा उपलब्ध कराना है।
कानून बनने से पहले बाकी हैं कई चरण
हालांकि विधेयक को अमेरिकी सीनेट में व्यापक राजनीतिक समर्थन मिलने की बात सामने आई है, लेकिन यह अभी कानून नहीं बना है। इसे पहले अमेरिकी सीनेट और फिर प्रतिनिधि सभा (House of Representatives) से पारित होना होगा। इसके बाद राष्ट्रपति के हस्ताक्षर मिलने पर ही यह कानून का रूप ले सकेगा। इसलिए फिलहाल इस प्रस्ताव का भारत या अन्य देशों पर कोई तत्काल कानूनी प्रभाव नहीं पड़ा है। आने वाले समय में अमेरिकी संसद की कार्यवाही और प्रशासन के फैसलों पर सभी की नजर रहेगी।