सुप्रीम कोर्ट का सख्त आदेश: नदियों की दर्ज चौड़ाई नहीं बदलेगी, दोनों ओर 100 मीटर सुरक्षा क्षेत्र अनिवार्य
राजस्थान की लूनी, बांडी और जोजरी नदी में प्रदूषण और अवैध बजरी खनन पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने नदी क्षेत्रों के आसपास नए औद्योगिक प्रतिष्ठानों की स्थापना पर रोक लगाई है। साथ ही नदी के दर्ज प्राकृतिक क्षेत्र में बदलाव नहीं करने और दोनों ओर 100 मीटर अतिरिक्त सुरक्षा क्षेत्र बनाए रखने का निर्देश दिया है। अवैध खनन के नेटवर्क और संभावित सरकारी मिलीभगत की जांच के लिए तीन दिन में एसआईटी गठित करने को कहा गया है।

मुख्य बातें
- नदियों की जमीन से छेड़छाड़ नहीं चलेगी, सुप्रीम कोर्ट का सख्त आदेश
- अवैध बजरी खनन की जांच के लिए बनेगी एसआईटी, अफसर भी जांच के दायरे में
- नदी किनारे नए उद्योगों पर रोक, भूजल और प्रदूषण पर भी मांगी रिपोर्ट
JODHPUR,07 NOV. 2026:
अवैध बजरी खनन की जांच के लिए तीन दिन में बनेगी एसआईटी
लूनी नदी प्रदूषण से जुड़े स्वत: संज्ञान मामले में सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने अवैध बजरी खनन को लेकर गंभीर चिंता जताई। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने खनन के संगठित नेटवर्क, इसमें शामिल लोगों और इससे लाभ उठाने वालों की जांच के निर्देश दिए।कोर्ट ने सरकारी अधिकारियों की संभावित मिलीभगत की भी जांच करने को कहा है। इसके लिए तीन दिन के भीतर विशेष जांच दल यानी एसआईटी गठित की जाएगी। इसमें जोधपुर, बालोतरा और पाली के पुलिस अधीक्षक शामिल होंगे। एसआईटी का नेतृत्व पुलिस महानिरीक्षक स्तर का अधिकारी करेगा।
पुराने अवैध खनन को बाद का पट्टा वैध नहीं बना सकता
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जिस क्षेत्र में पहले अवैध खनन हुआ है, वहां बाद में खनन पट्टा जारी होने से पुरानी गतिविधियां वैध नहीं हो जातीं। कोर्ट के अनुसार, खनन पट्टा जारी होना और पर्यावरणीय मानकों के अनुरूप खनन करना अलग-अलग आवश्यकताएं हैं।इसलिए केवल पट्टा जारी होने को नियमित खनन का प्रमाण नहीं माना जा सकता। खनन के दौरान नदी के प्राकृतिक प्रवाह, नदी तल, भूजल पुनर्भरण और पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों का आकलन भी जरूरी है।
नदी की दर्ज चौड़ाई से छेड़छाड़ पर रोक, दोनों ओर 100 मीटर सुरक्षा क्षेत्र
पीठ ने जल संसाधन विभाग की उस कवायद पर सवाल उठाए, जिसमें सीवेज और उपचारित गंदे पानी के प्रवाह के आधार पर नदियों की चौड़ाई और सीमाएं नए सिरे से तय की जा रही थीं। कोर्ट ने कहा कि नदी की भौगोलिक सीमा और प्राकृतिक स्वरूप का निर्धारण उसमें बहने वाले सीवेज की मात्रा से नहीं किया जा सकता।कोर्ट ने राजस्व और जल संसाधन विभाग के अभिलेखों में दर्ज नदी की बाहरी सीमाओं के दोनों ओर 100 मीटर अतिरिक्त सुरक्षा क्षेत्र बनाए रखने का निर्देश दिया। इसके अलावा, इन सीमाओं से 500 मीटर के भीतर लाल श्रेणी के उद्योग स्थापित नहीं किए जा सकेंगे।
हाई फ्लड लाइन तय होने तक नए उद्योगों को अनुमति नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नदी की हाई फ्लड लाइन और सुरक्षा क्षेत्र का वैज्ञानिक तरीके से निर्धारण होने तक आसपास नए औद्योगिक प्रतिष्ठानों की स्थापना की अनुमति नहीं दी जाएगी। इस आदेश का उद्देश्य नदी के प्राकृतिक क्षेत्र और पर्यावरणीय संतुलन को सुरक्षित रखना है।कोर्ट की चिंता है कि औद्योगिक गतिविधियों और प्रदूषण के कारण नदी तंत्र पर लगातार दबाव बढ़ रहा है। ऐसे में नदी की वास्तविक सीमाओं को बनाए रखना और प्रदूषण रोकने के उपाय करना जरूरी है।
कनाना में 458.6 हेक्टेयर क्षेत्र में खनन पर उठे सवाल
पीठ ने बालोतरा जिले की पचपदरा तहसील के कनाना गांव में खनन गतिविधियों का भी उल्लेख किया। यहां 458.6 हेक्टेयर क्षेत्र में पांच लगातार खनन भूखंड हैं। ये करीब 8.1 किलोमीटर नदी तल में फैले हुए हैं।इनमें से तीन भूखंडों पर खनन शुरू हो चुका है, जबकि दो अन्य भूखंडों के लिए पर्यावरणीय स्वीकृति लंबित है। संबंधित समिति ने इन दोनों भूखंडों को पर्यावरणीय स्वीकृति नहीं देने की सिफारिश की है। कोर्ट ने पूरे क्षेत्र में खनन के सामूहिक पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन करने की जरूरत बताई।
भूजल की उपलब्धता और गिरावट पर मांगी रिपोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय भूजल प्राधिकरण को मामले में पक्षकार बनाने का निर्देश दिया है। साथ ही जोधपुर, बालोतरा और पाली जिलों में भूजल की उपलब्धता, दोहन और गिरावट की स्थिति पर रिपोर्ट मांगी है।बालोतरा क्षेत्र में भूजल की गंभीर स्थिति और औद्योगिक गतिविधियों के प्रभाव को लेकर राज्य सरकार से अलग शपथ पत्र भी मांगा गया है। इससे क्षेत्र में जल संसाधनों पर पड़ रहे दबाव और संभावित पर्यावरणीय प्रभावों की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
औद्योगिक अपशिष्ट के निस्तारण और पुन: उपयोग पर जोर
पीठ ने जोधपुर, पाली और बालोतरा के औद्योगिक क्षेत्रों में साझा अपशिष्ट उपचार संयंत्रों की धीमी प्रगति पर भी चिंता जताई। कोर्ट ने शून्य तरल अपशिष्ट उत्सर्जन व्यवस्था को प्रभावी बनाने की जरूरत बताई।राज्य सरकार को औद्योगिक इकाइयों में शून्य तरल अपशिष्ट उत्सर्जन संयंत्र लगाने के लिए वित्तीय सहायता संबंधी नीति तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं। इसके साथ ही उपचारित पानी के दोबारा उपयोग के लिए पाइपलाइन नेटवर्क विकसित करने को कहा गया है।
27 नवंबर को होगी अगली सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता बलबीर सिंह को न्याय मित्र नियुक्त किया है। न्याय मित्र मामले से जुड़े पर्यावरणीय और कानूनी पहलुओं पर अदालत की सहायता करेंगे।अब इस मामले की अगली सुनवाई 27 नवंबर को होगी। उस दौरान एसआईटी गठन, भूजल की स्थिति और औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण से जुड़े निर्देशों के पालन की प्रगति महत्वपूर्ण रहेगी।
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