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साधु के भेष में राजनीति! पप्पू यादव के प्रदर्शन पर बवाल—आस्था बनाम सियासत

संसद के बाहर विरोध का एक ऐसा दृश्य सामने आया जिसने सियासत को एक बार फिर कटघरे में खड़ा कर दिया है। पूर्णिया सांसद पप्पू यादव साधु के भेष में नजर आए, भगवा वस्त्र पहने, हाथ में भगवान राम की तस्वीर लिए, और राम मंदिर के कथित चंदे में चोरी के मुद्दे पर प्रदर्शन करते दिखे। लेकिन यह प्रदर्शन अब विवाद में बदल चुका है।

जहांगीरपुरी थाने में उनके खिलाफ शिकायत दर्ज हुई है। आरोप है कि इस प्रदर्शन के दौरान धार्मिक प्रतीकों का अपमान किया गया, यहां तक कि भगवान राम लल्ला की तस्वीर को पैरों के नीचे रखने जैसी बात भी सामने आई—जिससे करोड़ों सनातनियों की भावनाएं आहत हुई हैं।

अब सवाल ये है—क्या विरोध का ये तरीका सही है?
क्या सियासत में सुर्खियों के लिए आस्था का मजाक उड़ाना जरूरी हो गया है?

राम मंदिर चंदे के मुद्दे पर जांच पहले से जारी है। एसआईटी इस पूरे मामले की तह तक जाने में लगी है, कई आरोपियों की गिरफ्तारी भी हो चुकी है। यानी कानून अपना काम कर रहा है। लेकिन इसके बावजूद संसद के बाहर इस तरह का प्रदर्शन—क्या ये सिर्फ एक राजनीतिक नौटंकी नहीं?

ये सिर्फ एक व्यक्ति का मामला नहीं है, ये सनातन का मजाक है… ये साधु-संतों के स्वरूप का अपमान है। भगवा सिर्फ एक रंग नहीं, करोड़ों लोगों की आस्था और पहचान है। उसे पहनकर अगर इस तरह का ड्रामा किया जाए, तो सवाल उठना लाजमी है।

और सबसे बड़ा सवाल—जनता ने आपको संसद क्यों भेजा है?
क्या इसलिए कि आप सड़क पर नाटक करें?
या इसलिए कि आप संसद में बैठकर जनहित के मुद्दों पर चर्चा करें?

आज संसद की कार्यवाही बार-बार बाधित होती है। चर्चा से बचा जाता है, बहस से किनारा किया जाता है, और फिर बाहर आकर प्रदर्शन कर सुर्खियां बटोरी जाती हैं। ये लोकतंत्र का कौन सा स्वरूप है?

विरोध करना आपका अधिकार है—लेकिन मर्यादा में।
आवाज उठाइए, सवाल पूछिए, सरकार को घेरिए…
लेकिन देश के स्वाभिमान और आस्था को गिराकर नहीं।

क्योंकि जब राजनीति आस्था का सहारा लेकर तमाशा बन जाती है,
तो नुकसान सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं—पूरे समाज का होता है।

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