13 साल बाद प्रबल हत्याकांड में इंसाफ: 313 सुनवाई और 17 गवाहों के बाद 7 दोषियों को उम्रकैद
उत्तर प्रदेश के बिजनौर में वर्ष 2012 के चर्चित प्रबल हत्याकांड में करीब 13 वर्षों तक चली कानूनी प्रक्रिया के बाद अदालत ने सात दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। अदालत ने प्रत्येक दोषी पर 1.25 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया। यह फैसला सैकड़ों सुनवाई, कई गवाहों की गवाही और लंबे न्यायिक संघर्ष के बाद आया है। मामले को जिले के सबसे चर्चित आपराधिक मामलों में गिना जाता है।
पार्टी के बाद लापता हुए प्रबल, बाद में नदी से मिला शव
अभियोजन पक्ष के अनुसार 19 दिसंबर 2012 को एक पार्टी के दौरान प्रबल की कुछ लोगों से कहासुनी हुई। आरोप है कि इसके बाद उन्हें पार्टी स्थल से बाहर ले जाकर गंभीर रूप से पीटा गया, जिससे उनकी मौत हो गई। आरोपियों ने कथित तौर पर साक्ष्य मिटाने के उद्देश्य से शव को वाहन में रखकर गंगा बैराज के पास नदी में फेंक दिया। शुरुआत में परिवार ने गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई थी। लगभग डेढ़ महीने बाद मेरठ के हस्तिनापुर क्षेत्र में गंगा नदी से एक शव बरामद हुआ, जिसकी पहचान मोबाइल फोन और उससे जुड़े विवरण के आधार पर परिजनों ने प्रबल के रूप में की।
13 साल चली कानूनी लड़ाई, 313 सुनवाई और 17 गवाह बने आधार
यह मामला वर्षों तक अदालत में विचाराधीन रहा। सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने 17 गवाहों के बयान और अन्य साक्ष्य अदालत के समक्ष प्रस्तुत किए। कुल 313 तारीखों पर चली न्यायिक प्रक्रिया के बाद अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची कि अभियोजन पक्ष आरोप सिद्ध करने में सफल रहा। इसके आधार पर सातों आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। अदालत के इस फैसले को लंबे समय से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे पीड़ित परिवार के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
जांच पर भी उठे सवाल, अधिकारियों की भूमिका की जांच के निर्देश
मामले की शुरुआती पुलिस जांच को लेकर भी समय-समय पर सवाल उठते रहे। पीड़ित परिवार ने आरोप लगाया था कि शुरुआती जांच में प्रभावशाली लोगों को लाभ पहुंचाने की कोशिश हुई। फैसले में अदालत ने तत्कालीन पुलिस अधिकारियों की भूमिका की जांच कराने और आवश्यक कानूनी कार्रवाई करने के निर्देश भी दिए हैं। हालांकि, संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया अलग जांच के माध्यम से पूरी की जाएगी।
परिवार ने नहीं छोड़ी इंसाफ की उम्मीद
प्रबल के परिवार ने पूरे मुकदमे के दौरान लगातार न्याय की लड़ाई जारी रखी। उनकी बहन प्राची ने वर्षों तक लगभग हर सुनवाई में मौजूद रहकर मामले की पैरवी का अनुसरण किया। परिवार का कहना है कि इस दौरान उन्हें कई तरह की चुनौतियों और दबावों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने कानूनी प्रक्रिया पर भरोसा बनाए रखा। इस फैसले के बाद परिवार ने इसे लंबे संघर्ष के बाद मिला न्याय बताया।
अदालत का संदेश: कानून के सामने रसूख नहीं चलता
दोषियों में कई ऐसे लोग शामिल हैं, जिन्हें स्थानीय स्तर पर प्रभावशाली माना जाता था। अदालत के फैसले ने यह संदेश दिया कि यदि पर्याप्त साक्ष्य और कानूनी आधार मौजूद हों, तो न्यायिक प्रक्रिया के सामने किसी भी व्यक्ति का प्रभाव या रसूख बाधा नहीं बन सकता। यह निर्णय उन मामलों में भी एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है, जहां न्याय पाने में लंबा समय लगता है, लेकिन कानूनी प्रक्रिया अंततः अपने निष्कर्ष तक पहुंचती है।
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