शहर बढ़े, पंचायतें घटीं: शहरीकरण की जद में ग्राम स्वराज
नागौर। 2 अक्टूबर 1959 का दिन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में खास महत्व रखता है। इसी दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने राजस्थान के नागौर से पंचायतीराज व्यवस्था का शुभारंभ किया था। राजस्थान सरकार के दस्तावेजों के अनुसार, इसी के साथ गांव, ब्लॉक और जिला स्तर पर त्रिस्तरीय लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की व्यवस्था ने औपचारिक रूप लिया।करीब सात दशक बाद पंचायतीराज व्यवस्था देश के ग्रामीण लोकतंत्र का महत्वपूर्ण आधार बन चुकी है। लेकिन इसी दौरान गांवों की भौगोलिक और प्रशासनिक तस्वीर भी बदल रही है। शहरों का विस्तार हो रहा है। गांव नगर निकायों में शामिल हो रहे हैं। कई जगह नई पंचायतें बन रही हैं, तो कई पंचायतें शहरी सीमा में समाहित हो रही हैं।ऐसे में सवाल सिर्फ गांवों की संख्या का नहीं है। सवाल यह भी है कि जिस ग्राम स्वराज की कल्पना की गई थी, वह बदलते शहरीकरण के बीच किस रूप में आगे बढ़ रहा है।
नागौर से शुरू हुआ था ग्राम लोकतंत्र का बड़ा प्रयोग
2 अक्टूबर 1959 को नागौर में पंचायतीराज की शुरुआत देश में लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की दिशा में बड़ा कदम थी। राजस्थान सरकार के अनुसार, शुरुआती व्यवस्था में ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद के स्तर पर प्रतिनिधि संस्थाएं बनाई गईं।बाद में 73वें संविधान संशोधन ने पंचायतीराज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा दिया। इससे ग्राम पंचायतों की भूमिका और जिम्मेदारियों को संवैधानिक आधार मिला। राजस्थान में भी इसके अनुरूप पंचायतीराज अधिनियम लागू किया गया।आज गांव का सरपंच केवल स्थानीय प्रतिनिधि नहीं है। वह ग्रामीण स्तर पर विकास योजनाओं, बुनियादी सुविधाओं और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन से जुड़ी महत्वपूर्ण कड़ी है।
डेढ़ दशक में बदली गांवों की तस्वीर
देश में शहरीकरण की रफ्तार बढ़ने के साथ ग्रामीण प्रशासन की सीमाएं भी बदल रही हैं। शहरों के आसपास बसे गांव धीरे-धीरे नगर पालिका, नगर परिषद या नगर निगम की सीमा में शामिल हो रहे हैं।उपलब्ध Local Government Directory के आंकड़ों के अनुसार, 2011 में देश में 6,40,932 गांव दर्ज थे। 2021 के लिए तैयार सूची में यह संख्या 6,39,083 बताई गई। यानी दोनों सूचियों के बीच 1,849 गांव का अंतर दिखाई देता है।हालांकि गांवों की संख्या में कमी को सीधे केवल शहरीकरण का परिणाम मानना सही नहीं होगा। प्रशासनिक पुनर्गठन, नए राजस्व गांव, सीमा परिवर्तन और रिकॉर्ड अपडेट जैसे कारण भी संख्या को प्रभावित करते हैं।
आंकड़ों में गांव बढ़े, फिर घटे
गांवों की संख्या का इतिहास देखें तो तस्वीर और दिलचस्प नजर आती है। वर्ष 2001 में देश में करीब 6.38 लाख गांव दर्ज थे। 2011 में यह संख्या बढ़कर 6,40,932 तक पहुंची।इसके बाद 2021 के लिए तैयार सूची में गांवों की संख्या 6,39,083 दर्ज हुई। इसका अर्थ यह नहीं है कि इतने गांव खत्म हो गए। कई बार प्रशासनिक सीमाओं में बदलाव के कारण एक गांव किसी दूसरे प्रशासनिक क्षेत्र का हिस्सा बन जाता है।इसलिए गांवों के आंकड़ों को केवल संख्या के रूप में देखने के बजाय उनके प्रशासनिक दर्जे में हुए बदलाव को भी समझना जरूरी है।
ग्राम पंचायतों की संख्या में भी बदलाव
ग्राम पंचायतों की संख्या भी समय के साथ लगातार बदलती रही है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक 2011 के आसपास देश में करीब 2.30 लाख ग्राम पंचायतें थीं। 2021 में इनकी संख्या 2,69,351 तक पहुंची।इसके बाद उपलब्ध 2026 के आंकड़ों में ग्राम पंचायतों की संख्या करीब 2.55 लाख बताई गई है। यानी पांच साल के अंतराल में संख्या में उल्लेखनीय कमी दिखाई देती है।इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। कुछ ग्रामीण क्षेत्र नए नगर निकायों में शामिल हुए। कुछ पंचायतों का पुनर्गठन हुआ। वहीं प्रशासनिक सीमाओं में बदलाव का असर भी पंचायतों की संख्या पर पड़ा।
राजस्थान में आज भी बड़ा है ग्रामीण दायरा
राजस्थान की स्थिति देश के मुकाबले अलग है। राज्य की बड़ी आबादी अभी भी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार राजस्थान में ग्रामीण आबादी का हिस्सा करीब 75 प्रतिशत है।इस लिहाज से पंचायतों की भूमिका राज्य में बेहद महत्वपूर्ण बनी हुई है। गांवों में सड़क, पानी, नाली, सफाई, आवास, रोजगार और विभिन्न सरकारी योजनाओं का स्थानीय स्तर पर क्रियान्वयन पंचायतों से जुड़ा है।यानी राजस्थान में शहरीकरण बढ़ने के बावजूद ग्राम स्वराज की जरूरत खत्म नहीं हुई है। बल्कि बदलती परिस्थितियों में इसकी भूमिका और अधिक प्रभावी बनाने की चुनौती सामने है।
शहर बढ़ रहे हैं, नगर निकायों का दायरा भी बढ़ा
दूसरी तरफ देश में शहरी प्रशासन का दायरा बढ़ रहा है। शहरी आवास योजनाओं के सरकारी आंकड़ों में भी बड़ी संख्या में शहर और कस्बे शामिल हैं। प्रधानमंत्री आवास योजना-शहरी के तहत हजारों शहरों को योजना के दायरे में लिया गया है।शहरों के विस्तार का सीधा असर आसपास के गांवों पर पड़ता है। जैसे-जैसे नगर सीमा बढ़ती है, गांव का प्रशासनिक स्वरूप भी बदल सकता है।ग्राम पंचायत की जगह नगर पालिका या नगर परिषद आने पर स्थानीय शासन की संरचना बदल जाती है। सरपंच और वार्ड पंच की जगह पार्षद और शहरी निकाय की व्यवस्था प्रभावी हो जाती है।
पंचायतें कम होना केवल नुकसान नहीं
ग्राम पंचायतों की संख्या घटना अपने आप में न तो पूरी तरह सकारात्मक है और न नकारात्मक। यदि किसी गांव को बेहतर शहरी सुविधाओं, सड़क, सीवर, जल निकासी और नियोजित विकास के लिए नगर निकाय में शामिल किया जाता है, तो इससे सुविधाओं का विस्तार हो सकता है।लेकिन दूसरी तरफ स्थानीय भागीदारी का स्वरूप बदल जाता है। ग्रामीण समाज की अपनी जरूरतों और स्थानीय प्राथमिकताओं को शहरी प्रशासन के बड़े ढांचे में जगह दिलाना चुनौती बन सकता है।यहीं पर ग्राम स्वराज की मूल भावना और शहरी विकास की जरूरत के बीच संतुलन महत्वपूर्ण हो जाता है।
पंचायतीराज का ढांचा अभी भी अधूरा
पंचायतीराज को संवैधानिक दर्जा मिलने के बावजूद जमीनी स्तर पर कई चुनौतियां बनी हुई हैं। राजस्थान में नई ग्राम पंचायतों के लिए पंचायत भवन, रिकॉर्ड व्यवस्था और जरूरी आधारभूत सुविधाओं का सवाल कई जगह सामने आता रहा है।कई पंचायतों में नियमित कार्यालय व्यवस्था और रिकॉर्ड प्रबंधन को बेहतर बनाने की जरूरत है। ग्राम विकास अधिकारी, सरपंच और वार्ड पंच का ढांचा मौजूद होने के बावजूद प्रशासनिक संसाधनों की उपलब्धता हर जगह एक जैसी नहीं है।यानी पंचायत बना देना और उसे प्रभावी स्थानीय सरकार बना देना, दोनों अलग बातें हैं।
सफाई और पानी निकासी अब भी बड़ी चुनौती
ग्रामीण विकास का सबसे बड़ा परीक्षण बुनियादी सुविधाओं से होता है। कई गांवों में नियमित सफाई, नालियों और पानी निकासी की व्यवस्था अभी भी चुनौती बनी हुई है।बरसात के समय गांवों की गलियों में जलभराव और कीचड़ की समस्या सामने आती है। गांवों को जोड़ने वाली सड़कों की स्थिति भी कई क्षेत्रों में चिंता का विषय रहती है।यदि ग्राम पंचायतों को वास्तविक स्थानीय सरकार बनाना है तो उन्हें केवल योजनाओं के क्रियान्वयन की एजेंसी नहीं, बल्कि स्थानीय बुनियादी ढांचे की जिम्मेदार संस्था के रूप में मजबूत करना होगा।
पंचायत से शुरू होकर सत्ता के बड़े पदों तक पहुंची राजनीति
पंचायतीराज की सबसे बड़ी उपलब्धियों में राजनीतिक भागीदारी का विस्तार भी शामिल है। गांव के स्तर से राजनीति शुरू करने वाले अनेक नेता आगे चलकर विधायक, सांसद और मंत्री तक पहुंचे हैं।राजस्थान में भी पंचायत राजनीति ने हजारों लोगों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जोड़ा है। इससे ग्रामीण समाज के अलग-अलग वर्गों को स्थानीय नेतृत्व का अवसर मिला।इसीलिए पंचायतों की संख्या घटने के साथ यह सवाल भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या स्थानीय राजनीतिक भागीदारी के अवसर भी बदल रहे हैं।
14 हजार से ज्यादा ग्राम पंचायतों में चुनाव की तैयारी
राजस्थान में आगामी पंचायतराज चुनावों का दायरा भी काफी बड़ा है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में 14,403 ग्राम पंचायतों में सरपंचों का निर्वाचन होना है। इसके साथ करीब 1.30 लाख वार्ड पंच भी चुने जाएंगे।यह संख्या बताती है कि शहरों के विस्तार के बावजूद राजस्थान में ग्रामीण लोकतंत्र का आधार अभी बहुत बड़ा है।ग्राम स्वराज की वास्तविक सफलता केवल पंचायतों की संख्या से तय नहीं होगी। इसके लिए जरूरी है कि पंचायतों के पास पर्याप्त संसाधन हों। उन्हें प्रशासनिक सहयोग मिले। ग्राम सभा प्रभावी हो। रिकॉर्ड पारदर्शी हों और ग्रामीणों की भागीदारी निर्णय प्रक्रिया में दिखाई दे।
शहर बढ़ें, लेकिन गांव की आवाज भी मजबूत रहे
2 अक्टूबर 1959 को नागौर से शुरू हुई पंचायतीराज की यात्रा आज एक नए मोड़ पर है। एक तरफ शहर तेजी से फैल रहे हैं। दूसरी तरफ गांवों का प्रशासनिक स्वरूप बदल रहा है।शहरीकरण विकास का स्वाभाविक हिस्सा है। लेकिन विकास के इस विस्तार में गांव की स्थानीय पहचान और निर्णय लेने की क्षमता कमजोर न हो, यह भी जरूरी है।
ग्राम स्वराज का मतलब केवल गांव को पंचायत बनाए रखना नहीं है। इसका अर्थ है गांव के लोगों को अपने विकास से जुड़े फैसलों में वास्तविक भागीदारी देना।
आज जब शहर बढ़ रहे हैं और पंचायतों की सीमाएं बदल रही हैं, तब नागौर से शुरू हुई उस लोकतांत्रिक सोच को नए संदर्भ में मजबूत करना ही सबसे बड़ी चुनौती है।