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राजस्थान के 12 जिलों में नहरी पानी का संकट! कृषि विभाग ने बदली खेती की रणनीति

राजस्थान में कमजोर मानसून का असर अब रबी की खेती पर भी दिखाई देने लगा है। बांधों और जलग्रहण क्षेत्रों में अपेक्षाकृत कम बारिश के कारण नहरी पानी की उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ी है। इसका असर प्रदेश के करीब 12 जिलों में देखने को मिल सकता है। खासतौर पर नहर आधारित खेती वाले क्षेत्रों में किसानों के सामने सिंचाई पानी की चुनौती खड़ी हो सकती है।स्थिति को देखते हुए कृषि विभाग ने किसानों को खेती की रणनीति में बदलाव की सलाह दी है। विभाग अब ऐसी फसलों और किस्मों की बिजाई पर जोर दे रहा है, जिन्हें कम सिंचाई में तैयार किया जा सके। किसानों को गेहूं जैसी अधिक पानी वाली फसल के साथ सरसों, चना और जौ जैसी कम पानी वाली फसलों के विकल्प अपनाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।

कमजोर मानसून के बाद बढ़ी पानी की चिंता

इस बार बांधों के जलग्रहण क्षेत्रों में मानसून अपेक्षाकृत कमजोर रहने की बात सामने आई है। इसका असर जलाशयों में पानी की उपलब्धता पर पड़ सकता है। राजस्थान के कई कृषि क्षेत्रों में रबी की फसल मुख्य रूप से नहरी और सिंचाई जल पर निर्भर रहती है।ऐसे में यदि सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध नहीं होता है, तो गेहूं जैसी फसलों की उत्पादकता प्रभावित हो सकती है। कृषि विभाग का मानना है कि किसानों को अभी से ऐसी फसलों का चुनाव करना चाहिए, जिनमें कम पानी की जरूरत होती है।

गेहूं की जगह सरसों, चना और जौ पर जोर

कृषि अधिकारियों के अनुसार गेहूं की फसल को कई चरणों में सिंचाई की आवश्यकता होती है। इसके मुकाबले सरसों, चना और जौ जैसी फसलों में अपेक्षाकृत कम पानी की जरूरत होती है।इसी वजह से किसानों को स्थानीय मिट्टी और पानी की उपलब्धता के हिसाब से फसल चुनने की सलाह दी जा रही है। विभाग का जोर केवल कम पानी वाली फसल लगाने पर नहीं है। किसानों को ऐसी उन्नत किस्में चुनने के लिए भी कहा जा रहा है, जो सीमित सिंचाई में बेहतर और स्थिर उत्पादन दे सकें।

हनुमानगढ़ में कम पानी वाले क्षेत्र ज्यादा

हनुमानगढ़ जिले में कृषि क्षेत्र का एक बड़ा हिस्सा ऐसी जमीन पर है, जहां मिट्टी हल्की है और सिंचाई पानी सीमित मात्रा में उपलब्ध रहता है। ऐसे क्षेत्रों में फसल का चयन बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।कृषि विभाग के अनुसार यहां क्षेत्र विशेष के हिसाब से सरसों और चने की अलग-अलग किस्मों को अपनाया जा सकता है। सरसों में RH-1975 और RH-1706 जैसी किस्मों को बेहतर उत्पादन और तेल गुणवत्ता के लिहाज से उपयोगी बताया गया है।वहीं सेम प्रभावित क्षेत्रों के लिए CS-58, CS-60 और CS-62 जैसी किस्मों का विकल्प बताया गया है। रेतीली और टिब्बा भूमि में RH-1424, RH-725 और RH-761 जैसी किस्मों का उपयोग किया जा सकता है। देर से बिजाई की स्थिति में RGN-236 को विकल्प के तौर पर अपनाया जा सकता है।

चने की इन किस्मों से मिल सकता है फायदा

कम सिंचाई वाले क्षेत्रों में चना भी किसानों के लिए महत्वपूर्ण विकल्प बन सकता है। कृषि विभाग के अनुसार समय पर सिंचित क्षेत्र में GNG-2171 यानी मीरा किस्म का चयन किया जा सकता है।वहीं पछेती बुवाई के लिए GNG-2261 यानी केशव किस्म को विकल्प बताया गया है। असिंचित क्षेत्र में GNG-2461 यानी मूमल की खेती की सलाह दी जा रही है।किस्म का चुनाव जमीन, बुवाई के समय और उपलब्ध पानी के अनुसार करने पर किसान सीमित संसाधनों में भी बेहतर उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं।

छिलका रहित जौ भी बन सकता है विकल्प

कृषि विभाग की सलाह में जौ की नई किस्मों को भी महत्व दिया जा रहा है। भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान, करनाल की ओर से विकसित छिलका रहित जौ की DWRB-223 किस्म को कम पानी वाली खेती के लिए उपयोगी बताया गया है।इस किस्म की खासियत यह है कि गेहूं की तुलना में इसकी खेती में करीब 30 से 40 प्रतिशत तक कम पानी और उर्वरक की जरूरत बताई जा रही है। इसकी औसत उपज लगभग 45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर बताई गई है।छिलका रहित दाने का उपयोग रोटी, दलिया और बिस्किट जैसे खाद्य पदार्थों में किया जा सकता है। कृषि विशेषज्ञ इसे पोषण और कम लागत वाली खेती के लिहाज से भी उपयोगी विकल्प मानते हैं।

दो सिंचाई में तैयार हो सकती है गेहूं की फसल

कृषि विभाग की रणनीति का मतलब यह नहीं है कि किसान गेहूं की खेती पूरी तरह छोड़ दें। कम पानी में गेहूं उत्पादन के लिए भी कुछ किस्मों को विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है।WH-1402, WH-1142 और DBW-296 जैसी किस्मों पर भी किसानों का ध्यान दिलाया जा रहा है। इनमें WH-1402 को सीमित सिंचाई वाले क्षेत्रों के लिए उपयोगी बताया गया है।जानकारी के अनुसार इस किस्म में करीब दो सिंचाई की आवश्यकता होती है। पहली सिंचाई बुवाई के लगभग 25 दिन बाद और दूसरी करीब 70 से 80 दिन के बीच की जा सकती है। अनुकूल परिस्थितियों में यह फसल लगभग 147 दिन में पककर तैयार हो सकती है।

खेती में बदलना होगा पुराना तरीका

कृषि अधिकारियों के अनुसार बदलती जलवायु परिस्थितियों में खेती का पारंपरिक तरीका लंबे समय तक पर्याप्त नहीं हो सकता। बढ़ता तापमान, अनियमित बारिश, सीमित सिंचाई पानी और खेती की बढ़ती लागत किसानों के सामने नई चुनौतियां पैदा कर रही हैं।ऐसे में केवल ज्यादा उत्पादन देने वाली किस्म चुनना पर्याप्त नहीं होगा। अब ऐसी किस्मों की जरूरत है, जो कम पानी में भी अपेक्षाकृत स्थिर उत्पादन दे सकें। फसल का चुनाव मिट्टी, तापमान, पानी की उपलब्धता और बुवाई के समय को ध्यान में रखकर करना होगा।

कम लागत वाली खेती पर कृषि विभाग का जोर

कृषि अनुसंधान अधिकारी राजेंद्र कुमार के अनुसार किसानों को कम सिंचाई वाली फसलों की ओर प्रेरित किया जा रहा है। खेती को लाभकारी बनाने के लिए लागत को नियंत्रित करना जरूरी है।कम पानी वाली फसलें अपनाने से सिंचाई पर होने वाला खर्च कम किया जा सकता है। साथ ही पानी की उपलब्धता के अनुसार फसल का चुनाव करने से उत्पादन जोखिम भी घटाया जा सकता है।

किसानों के लिए नई चुनौती और नया अवसर

राजस्थान में नहरी पानी की उपलब्धता आने वाले रबी सीजन में खेती का बड़ा कारक बन सकती है। कमजोर मानसून के कारण पैदा हुई स्थिति किसानों के लिए चुनौती जरूर है। लेकिन कृषि विभाग की नई रणनीति इसे खेती के तरीके में बदलाव के अवसर के रूप में भी देख रही है।सरसों, चना और जौ जैसी कम पानी वाली फसलों के साथ जल-कुशल गेहूं किस्मों का चयन किसानों को सीमित सिंचाई में खेती जारी रखने में मदद कर सकता है। हालांकि वास्तविक उत्पादन मिट्टी, मौसम, सिंचाई, कृषि प्रबंधन और स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।

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Stv News Rajasthan

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