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राजस्थान से कंबोडिया तक फैला साइबर ठगी नेटवर्क, फर्जी सिम से करोड़ों की ठगी का खुलासा

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने एक बड़े अंतरराष्ट्रीय साइबर ठगी गिरोह का पर्दाफाश करते हुए राजस्थान और पंजाब में कई ठिकानों पर छापेमारी की है। जांच में सामने आया है कि कुछ सिम विक्रेताओं ने लोगों के पहचान दस्तावेजों का दुरुपयोग कर हजारों सिम कार्ड सक्रिय किए, जिन्हें विदेशी नेटवर्क तक पहुंचाया गया। इन सिम कार्डों के जरिए भारत के नागरिकों को निशाना बनाकर बड़े पैमाने पर साइबर ठगी की जा रही थी। मामले ने टेलीकॉम सुरक्षा और साइबर अपराध को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

कई राज्यों में एक साथ हुई कार्रवाई

ईडी की जांच के तहत राजस्थान के जोधपुर, नागौर और किशनगढ़ सहित कई स्थानों तथा पंजाब के लुधियाना में एक साथ छापेमारी की गई। कुल सात ठिकानों पर की गई इस कार्रवाई का संबंध एक ऐसे नेटवर्क से बताया जा रहा है, जो विदेश से संचालित साइबर अपराध गतिविधियों से जुड़ा हुआ था। जांच एजेंसियों को संदेह है कि इस नेटवर्क के जरिए बड़ी संख्या में फर्जी या दुरुपयोग किए गए सिम कार्ड साइबर अपराधियों तक पहुंचाए गए, जिनका इस्तेमाल भारतीय नागरिकों को ठगने में किया जा रहा था।

दस्तावेजों के दुरुपयोग से सक्रिय किए गए हजारों सिम

प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि आम लोगों के आधार और अन्य पहचान दस्तावेजों का गलत इस्तेमाल कर बड़ी संख्या में सिम कार्ड सक्रिय किए गए। आरोप है कि इन सिम कार्डों को वास्तविक उपयोगकर्ताओं की जानकारी के बिना चालू कर विदेशी नेटवर्क तक पहुंचाया गया। जांच एजेंसियों ने लाखों मोबाइल नंबरों के डेटा का विश्लेषण किया, जिसमें कई नंबर संदिग्ध साइबर गतिविधियों से जुड़े पाए गए। इससे संकेत मिलता है कि यह कोई साधारण मामला नहीं, बल्कि संगठित स्तर पर चलाया जा रहा नेटवर्क था।

विदेशी ठिकानों से संचालित होती थी ठगी

जांच में यह भी सामने आया कि सक्रिय किए गए सिम कार्ड पहले अन्य देशों के माध्यम से विदेश भेजे जाते थे और बाद में साइबर ठगों द्वारा इस्तेमाल किए जाते थे। भारतीय मोबाइल नंबरों का उपयोग होने के कारण पीड़ितों को कॉल और संदेश विश्वसनीय लगते थे। इसी भरोसे का फायदा उठाकर लोगों को विभिन्न बहानों से जाल में फंसाया जाता था। एजेंसियों का मानना है कि इस नेटवर्क के जरिए देशभर में बड़ी संख्या में लोगों को निशाना बनाया गया।

डिजिटल अरेस्ट और निवेश के नाम पर ठगी

साइबर अपराधी कथित तौर पर खुद को पुलिस, जांच एजेंसी या अन्य सरकारी अधिकारी बताकर लोगों को डराते थे। कई मामलों में लोगों को फर्जी कानूनी कार्रवाई या डिजिटल गिरफ्तारी का भय दिखाया जाता था। वहीं कुछ मामलों में शेयर बाजार, ऑनलाइन निवेश और क्रिप्टोकरेंसी में भारी मुनाफे का लालच देकर धनराशि ठगी जाती थी। इस तरह की धोखाधड़ी में लोगों से रकम विभिन्न खातों में जमा करवाई जाती थी, जिसके बाद धन को कई माध्यमों से आगे ट्रांसफर किया जाता था।

जांच के दायरे में बैंक खाते और संपत्तियां

छापेमारी के दौरान जांच एजेंसियों को कई बैंक खातों, डिजिटल रिकॉर्ड और अन्य दस्तावेजों की जानकारी मिली है। कुछ चल और अचल संपत्तियां भी जांच के दायरे में लाई गई हैं। अधिकारियों का मानना है कि यह मामला एक बड़े अंतरराष्ट्रीय साइबर नेटवर्क से जुड़ा हो सकता है, जिसकी कई परतें अभी सामने आनी बाकी हैं। जांच जारी है और आने वाले दिनों में इस मामले में और महत्वपूर्ण खुलासे होने की संभावना जताई जा रही है।

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