डीजल महंगा, खेती हुई और खर्चीली: खरीफ सीजन से पहले किसानों की बढ़ी चिंता
अलवर जिले में खरीफ सीजन की तैयारियों के बीच किसानों की चिंता बढ़ गई है। डीजल की कीमतों में वृद्धि का सीधा असर खेती की लागत पर पड़ने लगा है। जुताई, सिंचाई, बुवाई, कटाई और फसल को मंडी तक पहुंचाने जैसे अधिकांश कार्य डीजल आधारित मशीनों और वाहनों पर निर्भर हैं। ऐसे में बढ़ती ईंधन लागत किसानों के बजट को प्रभावित कर रही है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि लागत बढ़ने के अनुपात में फसलों के उचित दाम नहीं मिले तो किसानों का मुनाफा कम हो सकता है।
खरीफ फसलों की लागत में आएगा बड़ा बदलाव
अलवर जिले में जल्द ही खरीफ फसलों की बुवाई शुरू होने वाली है। जिले में बाजरा, कपास, मक्का, ग्वार और ज्वार जैसी प्रमुख फसलें बड़े पैमाने पर बोई जाती हैं। इन फसलों की खेती में ट्रैक्टर, डीजल इंजन और अन्य कृषि मशीनों का व्यापक उपयोग होता है। डीजल महंगा होने से खेती के हर चरण की लागत बढ़ने की आशंका है। अनुमान है कि बाजरा और कपास जैसी फसलों में प्रति बीघा उत्पादन लागत में 400 से 500 रुपये तक की अतिरिक्त बढ़ोतरी हो सकती है, जिससे किसानों पर आर्थिक दबाव बढ़ेगा।
जुताई, सिंचाई और कटाई पर सबसे ज्यादा असर
खेती के दौरान सबसे अधिक खर्च जुताई, सिंचाई और कटाई जैसे कार्यों पर होता है। खेत की तैयारी के लिए ट्रैक्टर से जुताई, फसल अवधि में सिंचाई और अंत में कटाई के लिए मशीनों का उपयोग किया जाता है। इन सभी गतिविधियों में डीजल की बड़ी भूमिका होती है। डीजल की कीमत बढ़ने से मशीन संचालकों ने भी अपने किराए बढ़ाने शुरू कर दिए हैं। इसका सीधा असर खेती की कुल लागत पर पड़ रहा है। किसान मानते हैं कि यह अतिरिक्त खर्च उनकी आय को प्रभावित करेगा।
खेती की लागत पहले से ही ऊंचे स्तर पर
किसानों के अनुसार एक बीघा फसल तैयार करने में बीज, खाद, उर्वरक, कीटनाशक, सिंचाई और कटाई पर पहले से ही हजारों रुपये खर्च हो जाते हैं। बीज पर लगभग 1,000 से 1,500 रुपये, जुताई पर करीब 1,500 रुपये, खाद और उर्वरक पर लगभग 1,500 रुपये तथा सिंचाई और कटाई पर कई हजार रुपये खर्च होते हैं। अब डीजल महंगा होने से इन खर्चों में और बढ़ोतरी होने की संभावना है। ऐसे में खेती की कुल लागत लगातार बढ़ती जा रही है, जबकि किसानों की आय उसी अनुपात में नहीं बढ़ रही।
डीजल पंप वाले क्षेत्रों में बढ़ी परेशानी
जिले के अधिकांश क्षेत्रों में सिंचाई के लिए बिजली आधारित पंपों का उपयोग होता है, लेकिन कई इलाकों में बिजली की उपलब्धता सीमित होने के कारण किसान डीजल पंपों पर निर्भर हैं। थानागाजी, कठूमर और आसपास के कुछ क्षेत्रों में आज भी बड़ी संख्या में किसान डीजल इंजन से सिंचाई करते हैं। ऐसे किसानों पर डीजल मूल्य वृद्धि का प्रभाव और अधिक दिखाई देगा। सिंचाई की लागत बढ़ने से फसल उत्पादन की कुल लागत भी बढ़ेगी, जिससे छोटे और सीमांत किसानों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
मंडी तक फसल पहुंचाना भी हुआ महंगा
खेती की लागत केवल खेत तक सीमित नहीं रहती। फसल तैयार होने के बाद उसे मंडियों तक पहुंचाने के लिए ट्रैक्टर-ट्रॉली और अन्य मालवाहक वाहनों का उपयोग किया जाता है। डीजल महंगा होने के कारण परिवहन किराए में भी वृद्धि देखने को मिल रही है। इससे किसानों को फसल बेचने तक अतिरिक्त खर्च वहन करना पड़ सकता है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि बाजार में फसलों के दाम अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंचे, तो किसानों की वास्तविक आय में गिरावट आ सकती है और उनका लाभ कम हो सकता है।