चंद्रयान-3 का बड़ा खुलासा: ‘शिव शक्ति’ पॉइंट की मिट्टी का मिला चांद के पहले उल्कापिंड से अनोखा कनेक्शन
भारत के चंद्रयान-3 मिशन ने चंद्रमा के रहस्यों को समझने की दिशा में एक और बड़ी सफलता हासिल की है। प्रज्ञान रोवर द्वारा ‘शिव शक्ति’ पॉइंट पर की गई मिट्टी की जांच में ऐसे संकेत मिले हैं, जो चंद्रमा के पहले पहचाने गए उल्कापिंड से गहरा संबंध दर्शाते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह खोज चंद्रमा की प्राचीन सतह के निर्माण और उसके भूगर्भीय इतिहास को समझने में नई दिशा दे सकती है।
‘शिव शक्ति’ पॉइंट की मिट्टी और चंद्र उल्कापिंड में मिली समानता
चंद्रयान-3 के प्रज्ञान रोवर ने चंद्रमा के दक्षिणी उच्च अक्षांश क्षेत्र में स्थित ‘शिव शक्ति’ पॉइंट की मिट्टी का विस्तृत रासायनिक विश्लेषण किया। अध्ययन में सामने आया कि यहां की मिट्टी की संरचना चंद्रमा के पहले प्रमाणित उल्कापिंड ALHA 81005 से काफी हद तक मेल खाती है। दोनों नमूनों में एल्युमीनियम ऑक्साइड, आयरन ऑक्साइड और मैग्नीशियम ऑक्साइड की मात्रा लगभग समान पाई गई। यह समानता इस ओर संकेत करती है कि दोनों का संबंध चंद्रमा की प्राचीन सतह के समान भू-भाग से हो सकता है, जिससे वैज्ञानिकों को चंद्रमा के शुरुआती विकास को समझने में महत्वपूर्ण जानकारी मिलेगी।
पीआरएल वैज्ञानिकों के अध्ययन ने खोले नए वैज्ञानिक रास्ते
अहमदाबाद स्थित भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (PRL) के वैज्ञानिकों ने इस शोध को अंजाम दिया। अध्ययन का शीर्षक “Chandrayaan-3 APXS measurements reveal diversity in lunar highland compositions and links to lunar meteorites” है, जिसे प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका npj Space Exploration में प्रकाशित किया गया। शोधकर्ताओं ने प्रज्ञान रोवर के APXS (Alpha Particle X-ray Spectrometer) से प्राप्त आंकड़ों का विश्लेषण कर चंद्रमा के उच्च भूभाग की रासायनिक संरचना का अध्ययन किया। यह शोध भविष्य के चंद्र अभियानों और चंद्रमा के भूवैज्ञानिक विकास को समझने के लिए महत्वपूर्ण आधार प्रदान करता है।
इसरो ने बताया- उल्कापिंड सीधे ‘शिव शक्ति’ से नहीं आया
इसरो ने स्पष्ट किया है कि इस अध्ययन का अर्थ यह नहीं है कि ALHA 81005 उल्कापिंड सीधे ‘शिव शक्ति’ लैंडिंग स्थल से आया था। वैज्ञानिकों के अनुसार दोनों नमूने मैग्नीशियम से समृद्ध चंद्र सतह और रेगोलिथ के समान प्रकार का प्रतिनिधित्व करते हैं। यानी दोनों की रासायनिक प्रकृति समान हो सकती है, लेकिन उनके स्रोत का एक ही स्थान होना आवश्यक नहीं है। यह निष्कर्ष चंद्रमा की सतह के निर्माण और वहां मौजूद विभिन्न परतों की उत्पत्ति को समझने में अहम भूमिका निभाएगा।
1981 में मिला था चंद्रमा का पहला प्रमाणित उल्कापिंड
ALHA 81005 नामक इस उल्कापिंड की खोज वर्ष 1981-82 में अंटार्कटिका के एलन हिल्स क्षेत्र में हुई थी। बाद के वैज्ञानिक परीक्षणों में इसकी उत्पत्ति चंद्रमा से होने की पुष्टि हुई थी। अब चंद्रयान-3 के आंकड़ों से इसकी रासायनिक समानता सामने आने के बाद वैज्ञानिकों को चंद्रमा की सतह के विकास और उसके भूगर्भीय इतिहास के बारे में नई जानकारी मिलने की उम्मीद बढ़ गई है। इससे भविष्य में चंद्रमा की उत्पत्ति और उसकी संरचना पर होने वाले अनुसंधानों को भी मजबूती मिलेगी।
चंद्रमा की प्राचीन सतह को समझने में मिलेगी नई दिशा
अध्ययन के अनुसार ‘शिव शक्ति’ पॉइंट की मिट्टी चंद्रमा की सतह की अलग-अलग परतों से आए पदार्थों का मिश्रण है। इसका अर्थ है कि इस क्षेत्र में करोड़ों वर्षों तक हुए उल्कापिंडों के प्रभाव और भूगर्भीय प्रक्रियाओं ने विभिन्न परतों की सामग्री को एक साथ मिला दिया है। इसरो का कहना है कि चंद्रयान-3 के ये निष्कर्ष चंद्रमा की प्राचीन क्रस्ट के निर्माण, उसकी रासायनिक संरचना और विकासक्रम को समझने के लिए नए वैज्ञानिक अवसर प्रदान करेंगे। यह उपलब्धि भारत के चंद्र अनुसंधान कार्यक्रम को वैश्विक स्तर पर और अधिक मजबूत बनाती है।