7.75 लाख करोड़ राइट-ऑफ पर बेनीवाल का सवाल, ‘बड़े डिफॉल्टरों के नाम क्यों छिपा रही सरकार?’
लोकसभा में कॉरपोरेट लोन राइट-ऑफ से जुड़े सरकारी आंकड़े सामने आने के बाद नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल ने केंद्र सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब बैंकों ने 7.75 लाख करोड़ रुपये के कर्ज बट्टे खाते में डाले हैं, तो 100 करोड़ रुपये से अधिक के डिफॉल्टरों के नाम सार्वजनिक क्यों नहीं किए जा रहे।
लोकसभा में सरकार ने दिए बड़े आंकड़े
लोकसभा में पूछे गए एक लिखित प्रश्न के जवाब में वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने बताया कि वर्ष 2014-15 से 2025-26 के बीच सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने बड़े उद्योगों और सेवा क्षेत्र के उधारकर्ताओं के 7.75 लाख करोड़ रुपये से अधिक के ऋण राइट-ऑफ (बट्टे खाते) किए हैं। सरकार के अनुसार, इसी अवधि में इन खातों से करीब 3.10 लाख करोड़ रुपये की वसूली भी की गई। साथ ही 31 मार्च 2026 तक 100 करोड़ रुपये या उससे अधिक के बकाया वाले 1,249 बड़े उधारकर्ताओं पर कुल 4.19 लाख करोड़ रुपये का बकाया दर्ज है।
बेनीवाल ने पारदर्शिता पर उठाए सवाल
सरकारी जवाब के बाद नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल ने केंद्र सरकार से सवाल किया कि इतने बड़े कर्ज राइट-ऑफ होने के बावजूद संबंधित डिफॉल्टरों के नाम सार्वजनिक क्यों नहीं किए जा रहे। उन्होंने सोशल मीडिया पर कहा कि सरकार ने गोपनीयता का हवाला देकर 100 करोड़ रुपये से अधिक के डिफॉल्टरों की पहचान उजागर करने से इनकार कर दिया। बेनीवाल का कहना है कि जनता को यह जानने का अधिकार है कि बैंकों का इतना बड़ा पैसा किन कंपनियों और उधारकर्ताओं पर बकाया है।
किसानों और बड़े डिफॉल्टरों के साथ अलग व्यवहार का आरोप
बेनीवाल ने आरोप लगाया कि बैंक छोटे कर्जदारों और किसानों के खिलाफ बकाया वसूली के लिए सख्त कार्रवाई करते हैं, जबकि बड़े कॉरपोरेट डिफॉल्टरों के मामलों में पारदर्शिता नहीं दिखाई जाती। उन्होंने कहा कि यदि कोई किसान या आम नागरिक छोटा कर्ज नहीं चुका पाता तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई होती है, लेकिन बड़े बकायेदारों के नाम सार्वजनिक करने से सरकार पीछे हट रही है। उन्होंने इसे समानता और जवाबदेही के सिद्धांतों के विपरीत बताया।
राइट-ऑफ और कर्ज माफी में अंतर
इस पूरे मामले में यह स्पष्ट करना भी जरूरी है कि ‘राइट-ऑफ’ (Write-off) और ‘कर्ज माफी’ (Loan Waiver) एक जैसी प्रक्रिया नहीं हैं। राइट-ऑफ का अर्थ बैंक की बैलेंस शीट से ऋण को हटाना होता है, जबकि कर्ज की वसूली की प्रक्रिया जारी रह सकती है। वहीं कर्ज माफी में उधारकर्ता को ऋण चुकाने से पूरी तरह राहत मिल जाती है। ऐसे में सरकार की ओर से जारी आंकड़े राइट-ऑफ से संबंधित हैं, न कि कर्ज माफी से।