किराएदार नहीं, कलेजे के टुकड़े थे… हर आहट में लगता है बच्चे लौट आए; बारां हादसे ने छीना गुप्ता परिवार का अपना सा संसार
“वह मेरे किराएदार नहीं, मेरे परिवार का हिस्सा थे… मेरे अपने बच्चे थे। अब भी मकान में जरा सी आहट होती है, तो लगता है कि बच्चे आ गए…” यह कहते-कहते नगर विकास न्यास के वरिष्ठ संवेदक सीएल गुप्ता और उनकी पत्नी सरिता गुप्ता की आवाज भर आती है। आंखें नम हो जाती हैं। चार साल तक एक ही छत के नीचे हंसी-खुशी रहने वाला चिकित्सक परिवार अब हमेशा के लिए उनसे दूर हो चुका है। 21 सितंबर को बारां जिले में हुए दर्दनाक सड़क हादसे में डॉ. सुरेश गजराज, उनकी पत्नी डॉ. शालिनी मौर्य और उनके दो बच्चों की मौत हो गई। पीछे रह गया गुप्ता दंपती के घर में यादों और सन्नाटे से भरा एक कोना।
चार साल से गुप्ता दंपती के घर रह रहा था परिवार
सीएल गुप्ता और सरिता गुप्ता भीलवाड़ा के आरसी व्यास नगर में ऋषभ अस्पताल के सामने रहते हैं। उनके मकान में डॉ. सुरेश गजराज का परिवार करीब चार साल से रह रहा था।समय के साथ किराएदार और मकान मालिक का रिश्ता पारिवारिक रिश्ते में बदल गया। गुप्ता दंपती के अपने बच्चे बाहर रहते हैं। ऐसे में डॉ. गजराज का परिवार उनके घर का हिस्सा बन गया था।
बारां हादसे ने एक साथ चार जिंदगियां छीन लीं
21 सितंबर की सुबह बारां जिले में हुए सड़क हादसे ने गुप्ता दंपती के इस परिवार को हमेशा के लिए उनसे छीन लिया।हादसे में 42 वर्षीय डॉ. सुरेश गजराज, उनकी 41 वर्षीय पत्नी डॉ. शालिनी मौर्य, 11 वर्षीय बेटे स्वप्निल उर्फ कान्हा और चार वर्षीय बेटी निलिशा उर्फ गुड्डा की मौत हो गई।एक हंसता-खेलता परिवार पलभर में बिछड़ गया। हादसे की खबर ने गुप्ता दंपती को भी भीतर तक तोड़ दिया।
‘22 सितंबर की शाम तक लौट आएंगे’
डॉ. गजराज परिवार के साथ 20 सितंबर की सुबह बारां के लिए रवाना हुए थे। उन्हें अपने साले के बेटे के जन्मदिन में शामिल होना था।रवाना होते समय उन्होंने गुप्ता दंपती से कहा था कि बेटे की परीक्षा है। इसलिए वे 22 सितंबर की शाम तक वापस लौट आएंगे।लेकिन यह बातचीत उनकी आखिरी मुलाकात बन गई। गुप्ता दंपती के लिए अब वही शब्द सबसे दर्दनाक याद बन चुके हैं।
छोटी गुड्डा ने इसी घर में चलना सीखा था
गुप्ता दंपती बताते हैं कि छोटी निलिशा उर्फ गुड्डा ने इसी मकान में अपने जीवन के शुरुआती कदम बढ़ाए थे।वह यहीं चलना और बोलना सीख रही थी। दोनों बच्चे अक्सर गुप्ता दंपती के हिस्से में आ जाते थे। कभी टीवी देखते तो कभी खेलते रहते।बच्चों की मौजूदगी से घर में लगातार चहल-पहल रहती थी। अब वही घर उनकी आवाजों को तलाशता नजर आता है।
शालिनी गुप्ता दंपती को देती थीं माता-पिता जैसा सम्मान
डॉ. शालिनी मौर्य का गुप्ता दंपती से भी बेहद आत्मीय रिश्ता था। वे उन्हें पिता और माता जैसा सम्मान देती थीं।घर की चाबियां भी गुप्ता दंपती बेझिझक उन्हें सौंपकर बाहर चले जाते थे। दोनों परिवारों के बीच भरोसा इतना गहरा था कि किराएदार और मकान मालिक का फर्क लगभग खत्म हो चुका था।
डॉ. गजराज को था बागवानी का शौक
सीएल गुप्ता बताते हैं कि डॉ. सुरेश गजराज और डॉ. शालिनी मौर्य खुशमिजाज स्वभाव के थे। गजराज को बागवानी का विशेष शौक था।उन्होंने घर के एक हिस्से में गमलों की मदद से छोटा सा सुंदर पार्क तैयार किया था। पौधों की देखभाल वे खुद करते थे।आज वही छोटा सा बगीचा उनकी अनुपस्थिति में उदास नजर आता है।
सरकारी सेवा में रहते हुए घर पर मरीज नहीं देखते थे
गुप्ता दंपती के मुताबिक दोनों चिकित्सक सरकारी सेवा में थे। इसलिए वे घर पर मरीज देखने से बचते थे।उन्होंने घर के बाहर कोई साइन बोर्ड भी नहीं लगाया था। उनके लिए घर परिवार और रिश्तों के लिए था।गुप्ता दंपती के साथ उनके संबंध भी इसी सहजता और आत्मीयता से आगे बढ़े।
अब हर आहट में बच्चों की याद
हादसे के बाद गुप्ता दंपती के घर का माहौल पूरी तरह बदल गया है। जिस घर में बच्चों की आवाजें गूंजती थीं, वहां अब सन्नाटा पसरा है।सीएल गुप्ता और सरिता गुप्ता बताते हैं कि कभी-कभी घर में हल्की सी आहट होती है तो उन्हें लगता है कि बच्चे वापस आ गए हैं।लेकिन अगले ही पल हादसे की सच्चाई सामने आ जाती है। चार साल की आत्मीयता अब सिर्फ यादों में रह गई है।
घर का वह कोना अब भी उनकी याद दिलाता है
गुप्ता दंपती के लिए घर में मौजूद बच्चों की चीजें और डॉ. गजराज का बनाया छोटा सा बगीचा अब यादों का हिस्सा हैं।एक परिवार जो चार साल तक उनके साथ रहा, अचानक उनसे हमेशा के लिए दूर हो गया। बारां हादसे का दर्द सिर्फ एक परिवार तक सीमित नहीं रहा। इसने उन लोगों को भी गहरे सदमे में डाल दिया, जिनसे मृतक परिवार का खून का रिश्ता नहीं था, लेकिन भावनात्मक रिश्ता उससे कहीं गहरा था।
हादसे ने छोड़ दिया कभी न भरने वाला सूनापन
सड़क हादसे में चार लोगों की मौत ने दो परिवारों को गहरे दुख में डाल दिया है। एक तरफ अपने परिवार को खोने का दर्द है। दूसरी तरफ गुप्ता दंपती उस परिवार की यादों के साथ जीवन आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।उनके लिए डॉ. गजराज, डॉ. शालिनी और दोनों बच्चे सिर्फ किराएदार नहीं थे। वे घर की खुशियों का हिस्सा थे। अब उनकी यादें ही उस घर में बची हैं।