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मोदी की इंडो-पैसिफिक कूटनीति का बड़ा दांव, हिंद महासागर के रणनीतिक समुद्री मार्गों पर बढ़ेगी भारत की पकड़

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड यात्रा को केवल एक सामान्य राजनयिक दौरे के रूप में नहीं देखा जा रहा। रणनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह यात्रा इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत की समुद्री सुरक्षा, रक्षा सहयोग, आपूर्ति श्रृंखला और क्षेत्रीय साझेदारी को मजबूत करने की दिशा में अहम कदम साबित हो सकती है। विशेष रूप से हिंद महासागर और प्रशांत महासागर को जोड़ने वाले प्रमुख समुद्री मार्गों पर सहयोग बढ़ाना इस यात्रा का महत्वपूर्ण पहलू माना जा रहा है।

इंडो-पैसिफिक रणनीति में नई गति देने की तैयारी

पिछले एक दशक में भारत ने अपनी इंडो-पैसिफिक नीति को व्यापक रूप दिया है। अब यह रणनीति केवल समुद्री व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि क्षेत्रीय सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री संपर्क और बहुपक्षीय सहयोग का भी अहम हिस्सा बन चुकी है। विशेषज्ञों के अनुसार, प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा इसी व्यापक रणनीतिक सोच को आगे बढ़ाने की कोशिश है। जापान, ऑस्ट्रेलिया और आसियान देशों के साथ बढ़ते सहयोग के जरिए भारत इस क्षेत्र में अपनी भूमिका को और मजबूत करना चाहता है।

तीन अहम जलडमरूमध्य क्यों हैं इतने महत्वपूर्ण?

मलक्का, सुंडा और लोम्बोक जलडमरूमध्य हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के बीच सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग माने जाते हैं। एशिया के बड़े हिस्से का ऊर्जा आयात और अंतरराष्ट्रीय व्यापार इन्हीं रास्तों से होकर गुजरता है। रणनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन समुद्री मार्गों की सुरक्षा और निगरानी इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शक्ति संतुलन बनाए रखने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। भारत, ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया के बीच बढ़ता सहयोग इन्हीं समुद्री मार्गों की सुरक्षा को लेकर भी अहम माना जा रहा है।

सबांग बंदरगाह से बढ़ सकती है समुद्री निगरानी

भारत और इंडोनेशिया के बीच सबांग बंदरगाह पर सहयोग लंबे समय से चर्चा में है। अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह के निकट स्थित यह बंदरगाह हिंद महासागर में समुद्री गतिविधियों की निगरानी के लिहाज से रणनीतिक महत्व रखता है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस क्षेत्र में सहयोग बढ़ने से समुद्री सुरक्षा, व्यापारिक मार्गों की निगरानी और मानवीय सहायता अभियानों में दोनों देशों की क्षमता मजबूत हो सकती है।

ऑस्ट्रेलिया के साथ रक्षा साझेदारी हुई और मजबूत

भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच हुए म्यूचुअल लॉजिस्टिक्स सपोर्ट एग्रीमेंट (MLSA) के तहत दोनों देशों की सेनाएं एक-दूसरे के सैन्य ठिकानों का लॉजिस्टिक सहयोग के लिए उपयोग कर सकती हैं। इस व्यवस्था से भारतीय नौसेना और वायुसेना को ऑस्ट्रेलिया के कोकोस (कीलिंग) द्वीप समूह और डार्विन क्षेत्र में आवश्यक लॉजिस्टिक सुविधाएं मिल सकती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे हिंद महासागर और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत की परिचालन क्षमता और समुद्री उपस्थिति मजबूत होगी।

दुर्लभ खनिज और सप्लाई चेन पर भी रहेगा फोकस

इंडोनेशिया दुनिया के महत्वपूर्ण दुर्लभ खनिज (क्रिटिकल मिनरल्स) उत्पादक देशों में शामिल है। स्वच्छ ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन और आधुनिक तकनीक के लिए इन खनिजों की मांग लगातार बढ़ रही है। ऐसे में भारत और इंडोनेशिया के बीच इस क्षेत्र में सहयोग बढ़ने से दोनों देशों को आपूर्ति श्रृंखला मजबूत करने का अवसर मिल सकता है। इससे भारत की ऊर्जा परिवर्तन और विनिर्माण योजनाओं को भी गति मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।

क्वाड और क्षेत्रीय साझेदारी को मिल सकती है मजबूती

भारत, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और जापान क्वाड (Quad) समूह के सदस्य हैं, जिसका उद्देश्य मुक्त, समावेशी और नियम-आधारित इंडो-पैसिफिक क्षेत्र को बढ़ावा देना है। पिछले कुछ वर्षों में भारत और ऑस्ट्रेलिया के संबंध रक्षा, व्यापार, शिक्षा, तकनीक, स्वच्छ ऊर्जा और समुद्री सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में लगातार मजबूत हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा इन रणनीतिक साझेदारियों को नई दिशा देने और क्षेत्रीय सहयोग को और गहरा करने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।

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