चिनाब परियोजनाओं पर पाकिस्तानी विशेषज्ञ का दावा, अंतरराष्ट्रीय कानून को लेकर उठाए सवाल
भारत द्वारा सिंधु जल संधि (IWT) को निलंबित करने और चिनाब नदी पर जलविद्युत परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के बीच पाकिस्तान में इस मुद्दे पर बहस तेज हो गई है। पाकिस्तान के पूर्व कार्यवाहक कानून मंत्री और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील अहमर बिलाल सूफी ने एक लेख में दावा किया है कि कुछ परिस्थितियों में निर्माणाधीन बांधों को अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के तहत मिलने वाली सुरक्षा सीमित हो सकती है। हालांकि, यह उनका कानूनी विश्लेषण है और इस पर कोई अंतरराष्ट्रीय न्यायिक निर्णय या आधिकारिक सहमति मौजूद नहीं है।
सिंधु जल संधि के बाद बढ़ा जल विवाद
पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल संधि को निलंबित करने का फैसला लिया था। इसके बाद भारत ने चिनाब नदी पर अपनी विभिन्न जलविद्युत परियोजनाओं की प्रगति तेज की। पाकिस्तान लगातार इन परियोजनाओं पर चिंता जताता रहा है और दोनों देशों के बीच जल संसाधनों को लेकर तनाव बना हुआ है। इसी पृष्ठभूमि में पाकिस्तान के कानूनी विशेषज्ञों की ओर से अंतरराष्ट्रीय कानून की अलग-अलग व्याख्याएं सामने आ रही हैं।
क्या कहा पाकिस्तानी विशेषज्ञ ने?
अहमर बिलाल सूफी ने अपने लेख में 1949 के जिनेवा कन्वेंशन के अतिरिक्त प्रोटोकॉल-I के अनुच्छेद 56 का हवाला देते हुए तर्क दिया कि युद्ध की स्थिति में बांध और जल संरचनाओं को विशेष सुरक्षा प्राप्त होती है। हालांकि, उनका दावा है कि यदि किसी संरचना का उपयोग सैन्य उद्देश्य से किया जा रहा हो या उसे ऐसे उद्देश्य से जोड़ा जाए, तो उसकी कानूनी स्थिति अलग हो सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि निर्माणाधीन और अभी तक पानी से नहीं भरे बांधों की स्थिति पर अलग कानूनी बहस मौजूद है।
भारत की परियोजनाओं का दिया उदाहरण
अपने तर्क के समर्थन में सूफी ने चिनाब बेसिन में भारत की जलविद्युत परियोजनाओं—पाकल डुल, किरू, क्वार, रातले और सवालकोट—का उल्लेख किया। उन्होंने कुछ भारतीय सार्वजनिक बयानों का हवाला देते हुए यह दावा किया कि पाकिस्तान भविष्य में इन परियोजनाओं को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अलग दृष्टिकोण से चुनौती देने की कोशिश कर सकता है। हालांकि, भारत की ओर से इन परियोजनाओं को ऊर्जा उत्पादन और जल प्रबंधन से जुड़ी वैध परियोजनाएं बताया जाता रहा है।
अंतरराष्ट्रीय कानून क्या कहता है?
अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के तहत बांध, तटबंध और परमाणु ऊर्जा संयंत्र जैसी संरचनाओं को सामान्य परिस्थितियों में विशेष सुरक्षा प्राप्त होती है, क्योंकि इन पर हमला बड़ी मानवीय त्रासदी का कारण बन सकता है। हालांकि, किसी विशेष स्थिति में इन प्रावधानों की व्याख्या तथ्यों, परिस्थितियों और अंतरराष्ट्रीय न्यायिक संस्थाओं की समीक्षा पर निर्भर करती है। इसलिए किसी एक विशेषज्ञ की राय को अंतिम कानूनी निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।
आगे क्या हो सकता है?
भारत और पाकिस्तान के बीच जल विवाद आने वाले समय में कूटनीतिक और कानूनी मंचों पर और अधिक चर्चा का विषय बन सकता है। सिंधु जल संधि, जलविद्युत परियोजनाओं और अंतरराष्ट्रीय कानून से जुड़े सभी मुद्दों पर अंतिम स्थिति द्विपक्षीय वार्ता, अंतरराष्ट्रीय प्रक्रियाओं और संबंधित संस्थाओं के निर्णयों पर निर्भर करेगी। फिलहाल पाकिस्तान के पूर्व कानून मंत्री का यह लेख कानूनी बहस का हिस्सा है, न कि किसी अंतरराष्ट्रीय संस्था का आधिकारिक निर्णय।