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हंगोर सबमरीन प्रोजेक्ट में देरी, पाकिस्तान की नौसैनिक योजनाओं पर सवाल

पाकिस्तान की नौसेना के लिए चीन के सहयोग से विकसित हंगोर क्लास पनडुब्बी प्रोग्राम एक महत्वपूर्ण रक्षा परियोजना माना जा रहा है, लेकिन इसमें लगातार हो रही देरी और तकनीकी चुनौतियों ने इसकी प्रगति पर सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अब तक निर्धारित समयसीमा के मुकाबले केवल एक पनडुब्बी ही पाकिस्तान को मिल सकी है।

चीन-पाकिस्तान समझौते के तहत बड़ा रक्षा प्रोजेक्ट

साल 2015 में पाकिस्तान और चीन के बीच आठ हंगोर क्लास पनडुब्बियों के निर्माण का समझौता हुआ था। इस प्रोजेक्ट के तहत चार पनडुब्बियां चीन में और चार पाकिस्तान के कराची शिपयार्ड एंड इंजीनियरिंग वर्क्स (KSEW) में बनाई जानी थीं। यह सौदा पाकिस्तान के रक्षा इतिहास के सबसे बड़े सहयोग कार्यक्रमों में से एक माना जाता है।

डिलीवरी में लगातार देरी

समझौते के अनुसार पहली पनडुब्बी की डिलीवरी 2023 तक होनी थी, लेकिन 2026 तक केवल एक पनडुब्बी पाकिस्तान को मिल पाई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, चीन में निर्मित कुछ पनडुब्बियां परीक्षण चरण में हैं, जबकि परियोजना का शेष कार्य भी निर्धारित समय से पीछे चल रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि पूरी परियोजना की समयसीमा अब आगे खिसककर 2028 से 2030 तक जा सकती है।

तकनीकी चुनौतियां और इंजन विवाद

शुरुआत में इस परियोजना के लिए जर्मन इंजन तकनीक का चयन किया गया था, लेकिन बाद में निर्यात अनुमति न मिलने के कारण चीन निर्मित इंजन का उपयोग करना पड़ा। इस बदलाव को परियोजना में देरी और तकनीकी समायोजन की प्रमुख वजहों में से एक माना जा रहा है। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह के बदलाव जटिल नौसैनिक प्रोजेक्ट्स की गति को प्रभावित करते हैं।

कराची शिपयार्ड में निर्माण से जुड़ी चुनौतियां

परियोजना का हिस्सा बनने वाले कराची शिपयार्ड में चार पनडुब्बियों का निर्माण किया जाना है। हालांकि, यहां इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने में समय और संसाधन दोनों लग रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अत्याधुनिक पनडुब्बियों का निर्माण तकनीकी रूप से जटिल प्रक्रिया है और इसके लिए लंबे समय तक स्थिर औद्योगिक क्षमता की आवश्यकता होती है।

रणनीतिक महत्व और क्षेत्रीय योजना

रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया है कि पाकिस्तान की नौसेना इन पनडुब्बियों के जरिए बंगाल की खाड़ी में अपनी उपस्थिति बढ़ाने की योजना पर विचार कर रही है। यह क्षेत्र पहले 1971 के युद्ध के बाद से पाकिस्तान की सक्रिय नौसैनिक मौजूदगी से बाहर रहा है। हालांकि, इस तरह की किसी भी रणनीति को क्षेत्रीय सुरक्षा और भू-राजनीतिक दृष्टिकोण से बेहद संवेदनशील माना जाता है।

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