दुर्लभ बीमारी से जूझ रही मासूम को झटका, केंद्र ने इलाज सहायता देने से किया इनकार
दिल्ली हाईकोर्ट में एक तीन वर्षीय बच्ची के इलाज को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई में नया मोड़ आ गया है। दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी से पीड़ित इस बच्ची के परिवार ने केंद्र सरकार से आर्थिक सहायता की मांग की थी, लेकिन केंद्र ने अदालत में स्पष्ट कर दिया है कि मौजूदा नीति के तहत बच्ची वित्तीय सहायता पाने की पात्र नहीं है। सरकार का कहना है कि जिस बीमारी से बच्ची पीड़ित है, वह राष्ट्रीय दुर्लभ बीमारी नीति के तहत अधिसूचित बीमारियों की सूची में शामिल नहीं है। अब इस मामले ने दुर्लभ बीमारियों से जूझ रहे मरीजों की सहायता व्यवस्था पर नई बहस छेड़ दी है।
हाईकोर्ट पहुंचा परिवार, मांगी आर्थिक सहायता
बच्ची के पिता ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर कर केंद्र सरकार से इलाज के लिए वित्तीय मदद उपलब्ध कराने की मांग की थी। याचिका में कहा गया कि बच्ची एक गंभीर और दुर्लभ आनुवंशिक रोग से पीड़ित है, जिसके उपचार पर भारी खर्च आ रहा है। परिवार का तर्क है कि इतनी महंगी चिकित्सा व्यवस्था का खर्च उठाना उनके लिए संभव नहीं है, इसलिए सरकार को हस्तक्षेप कर सहायता प्रदान करनी चाहिए। इसी याचिका पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने अपना पक्ष अदालत के समक्ष रखा।
केंद्र सरकार ने नीति का हवाला देकर किया इनकार
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा अदालत में दाखिल हलफनामे में कहा गया है कि राष्ट्रीय दुर्लभ बीमारी नीति (NPRD) 2021 के तहत केवल निर्धारित और अधिसूचित बीमारियों के मरीजों को ही आर्थिक सहायता दी जा सकती है। सरकार ने बताया कि वर्तमान नीति के अंतर्गत 63 दुर्लभ बीमारियां शामिल हैं, जबकि एलआरबीए डेफिसिएंसी नामक बीमारी इस सूची का हिस्सा नहीं है। इसलिए नियमों के अनुसार बच्ची को इस योजना का लाभ नहीं दिया जा सकता। केंद्र का कहना है कि नीति के दायरे से बाहर जाकर सहायता प्रदान करना संभव नहीं है।
50 लाख रुपये तक सहायता का प्रावधान, लेकिन शर्तों के साथ
केंद्र सरकार ने अपने जवाब में बताया कि राष्ट्रीय दुर्लभ बीमारी नीति के तहत पात्र मरीजों को अधिकतम 50 लाख रुपये तक की वित्तीय सहायता दी जाती है। हालांकि यह सहायता केवल उन्हीं मामलों में उपलब्ध है जो अधिसूचित बीमारियों की सूची में शामिल हैं। सरकार का तर्क है कि यदि सूची से बाहर की बीमारियों के लिए भी सहायता दी जाने लगे तो नीति का मूल ढांचा प्रभावित होगा। इसलिए पात्रता का निर्धारण पूरी तरह नीति में तय मानकों के आधार पर किया जाता है।
अदालत से कहा- नीति बदलना न्यायपालिका का काम नहीं
केंद्र सरकार ने अदालत में यह भी कहा कि किसी बीमारी को दुर्लभ रोगों की सूची में शामिल करना या नहीं करना पूरी तरह नीतिगत फैसला है। सरकार के अनुसार यह अधिकार कार्यपालिका के पास है और अदालत किसी नीति में संशोधन करने का निर्देश नहीं दे सकती। हलफनामे में कहा गया कि यदि न्यायालय किसी विशेष बीमारी के लिए अलग से सहायता देने का आदेश देता है तो यह नीति में न्यायिक हस्तक्षेप माना जाएगा। सरकार ने इस मामले में अदालत से मौजूदा नियमों और नीति को ध्यान में रखने की अपील की है।
दुर्लभ बीमारियों की सहायता व्यवस्था पर उठे सवाल
इस मामले ने एक बार फिर दुर्लभ बीमारियों से पीड़ित मरीजों के उपचार और सहायता व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि कई ऐसी गंभीर बीमारियां हैं जो अभी भी सरकारी सहायता सूची में शामिल नहीं हैं, जबकि उनका इलाज अत्यंत महंगा है। ऐसे में प्रभावित परिवारों को आर्थिक और मानसिक दोनों तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। अब सभी की नजर दिल्ली हाईकोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी है, जहां इस संवेदनशील मामले में आगे की दिशा तय होगी।