सरिस्का की वादियों में गूंजे “जय माता दी” के स्वर, चैत्र नवरात्रि में करणी माता मंदिर बना आस्था का केंद्र
राजस्थान के अलवर जिले में सरिस्का की सुरम्य पहाड़ियों के बीच स्थित बाला किला क्षेत्र का करणी माता मंदिर इन दिनों भक्ति और आस्था के रंग में पूरी तरह रंगा हुआ है। चैत्र नवरात्रि के पावन अवसर पर यहां श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा है—चारों ओर गूंजते “जय माता दी” के जयकारे, मंदिर की घंटियों की मधुर ध्वनि और भक्तों की उमंग इस स्थल को आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर कर रहे हैं।
चैत्र नवरात्रि हिंदू धर्म का वह विशेष पर्व है, जब शक्ति की उपासना अपने चरम पर होती है। नौ दिनों तक मां दुर्गा के नौ अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है और भक्त उपवास, जप और साधना के जरिए देवी का आशीर्वाद प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। वर्ष 2026 में चैत्र नवरात्रि की शुरुआत 19 मार्च से हुई है और इसका समापन 27 मार्च को होगा। वसंत ऋतु में पड़ने के कारण इसे वासंती नवरात्र भी कहा जाता है, जो प्रकृति और भक्ति के सुंदर संगम का प्रतीक है।
इसी पावन अवसर पर करणी माता मंदिर में भी नवरात्र मेले का भव्य आयोजन किया जा रहा है। नव संवत्सर के दिन वन मंत्री संजय शर्मा ने विधिवत पूजा-अर्चना कर मेले का शुभारंभ किया था। तब से हर दिन हजारों श्रद्धालु कठिन पहाड़ी रास्तों को पार कर माता के दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं। यह मंदिर न केवल अलवर, बल्कि राजस्थान और आसपास के कई राज्यों के श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बन चुका है।
मंदिर का इतिहास भी बेहद रोचक और आस्था से जुड़ा हुआ है। अलवर रियासत के द्वितीय शासक बख्तावर सिंह ने 1792 से 1815 के बीच अपनी एक मन्नत पूरी होने पर इस मंदिर की स्थापना कराई थी। जनश्रुति के अनुसार, एक समय वे असहनीय पेट दर्द से पीड़ित थे और कई उपचारों के बावजूद उन्हें राहत नहीं मिल रही थी। तभी दरबार के एक रक्षक ने उन्हें मां करणी की आराधना करने की सलाह दी।
श्रद्धा और विश्वास के साथ की गई प्रार्थना ने मानो चमत्कार कर दिया। कहा जाता है कि उसी दौरान एक सफेद चील बाला किला पर आकर बैठी और जैसे ही शासक की नजर उस पर पड़ी, उनका दर्द समाप्त हो गया। इसे देवी की कृपा मानते हुए उन्होंने उसी स्थान पर करणी माता मंदिर का निर्माण करवाया।
इतिहासकारों के अनुसार, उनकी पत्नी रूपकंवर भी देशनोक स्थित करणी माता की परम भक्त थीं और उन्होंने इस घटना को देवी की दिव्य शक्ति का परिणाम माना। तभी से इस मंदिर में नियमित पूजा-अर्चना की परंपरा चली आ रही है।
समय के साथ मंदिर की महिमा और लोकप्रियता बढ़ती गई। वर्ष 1982 में यहां तक पहुंचने के लिए सड़क और साफ-सफाई की बेहतर व्यवस्था होने के बाद श्रद्धालुओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। तभी से नवरात्र के दौरान यहां विशाल मेले का आयोजन होने लगा, जो आज एक बड़े धार्मिक उत्सव का रूप ले चुका है।
आज सरिस्का की प्राकृतिक खूबसूरती और ऐतिहासिक विरासत के बीच स्थित यह मंदिर न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि हर श्रद्धालु के लिए एक अद्भुत आध्यात्मिक अनुभव भी बन गया है—जहां हर कोई “जय माता दी” के जयघोष के साथ अपनी मनोकामनाएं लेकर पहुंचता है।