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यूक्रेन को मिलेंगे 16 राफेल F4 जेट, रूस के Su-57 से बढ़ेगी हवाई मुकाबले की चुनौती

रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच यूक्रेन ने अपनी वायु शक्ति बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। फ्रांस से 16 अत्याधुनिक राफेल F4 लड़ाकू विमान खरीदने का समझौता यूक्रेन की रक्षा क्षमता को नई मजबूती देगा। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि रूस के पांचवीं पीढ़ी के Su-57 स्टील्थ फाइटर के मुकाबले राफेल की कुछ तकनीकी सीमाएं हैं, लेकिन आधुनिक हथियार, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और नेटवर्क आधारित युद्ध क्षमता के कारण यह रूसी वायुसेना के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है।

यूक्रेन-फ्रांस रक्षा समझौते से वायुसेना को मिलेगी नई ताकत

फ्रांस और यूक्रेन के बीच रक्षा सहयोग के तहत 16 राफेल F4 लड़ाकू विमानों की पहली बड़ी डील सामने आई है। इन विमानों की डिलीवरी वर्ष 2028-29 के बीच शुरू होने की संभावना है। दोनों देशों के बीच हुए दीर्घकालिक रक्षा सहयोग समझौते के अनुसार भविष्य में यूक्रेन के बेड़े में राफेल की संख्या बढ़ाकर लगभग 100 तक की जा सकती है। फ्रांस पहले ही यूक्रेन को मिराज-2000 लड़ाकू विमान उपलब्ध करा चुका है और अब राफेल के शामिल होने से यूक्रेनी वायुसेना की मारक क्षमता और आधुनिक युद्ध संचालन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होने की उम्मीद है।

राफेल बनाम Su-57: तकनीक और क्षमता में क्या है अंतर?

राफेल F4 को दुनिया के सबसे सक्षम 4.5 पीढ़ी के मल्टीरोल लड़ाकू विमानों में गिना जाता है। इसमें आधुनिक AESA रडार, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम, लंबी दूरी की हवा से हवा और हवा से जमीन पर मार करने वाली मिसाइलों को ले जाने की क्षमता मौजूद है। दूसरी ओर रूस का Su-57 पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ फाइटर जेट है, जिसे कम रडार पहचान, अधिक हथियार क्षमता, लंबी रेंज और उन्नत सेंसर तकनीक के लिए विकसित किया गया है। तकनीकी रूप से Su-57 कई मामलों में आगे माना जाता है, लेकिन वास्तविक युद्ध में परिणाम केवल विमान नहीं बल्कि पायलट, हथियार, रणनीति और नेटवर्क सपोर्ट पर भी निर्भर करते हैं।

मिराज-2000 का अनुभव राफेल संचालन में बनेगा फायदा

यूक्रेन की वायुसेना पहले से फ्रांस द्वारा दिए गए मिराज-2000 विमानों का संचालन कर रही है। रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि मिराज और राफेल के कई ऑपरेशन और प्रशिक्षण मानकों में समानता होने से यूक्रेनी पायलटों को नए विमान अपनाने में अपेक्षाकृत कम समय लगेगा। फ्रांस पहले ही यूक्रेनी पायलटों और तकनीकी स्टाफ का प्रशिक्षण शुरू कर चुका है। इससे राफेल के युद्ध में शामिल होने के बाद उसकी परिचालन क्षमता तेजी से विकसित होने की संभावना जताई जा रही है।

रूस के लिए क्यों बन सकता है राफेल नई चुनौती?

हालांकि Su-57 को स्टील्थ और लंबी दूरी की क्षमताओं के कारण अधिक उन्नत माना जाता है, लेकिन राफेल अपनी सटीक स्ट्राइक, इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग और आधुनिक मिसाइल प्रणाली के कारण बेहद प्रभावी लड़ाकू विमान है। यदि इसे पश्चिमी देशों की खुफिया जानकारी, एयर डिफेंस नेटवर्क और आधुनिक हथियारों का समर्थन मिलता है, तो यह रूसी विमानों के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक हवाई युद्ध केवल विमान की तकनीक से नहीं बल्कि पूरे युद्ध नेटवर्क और मिशन प्लानिंग से तय होता है।

भारत से भी जुड़ा है दोनों लड़ाकू विमानों का संबंध

राफेल और Su-57 दोनों का भारत से भी महत्वपूर्ण संबंध है। भारतीय वायुसेना पहले से राफेल का संचालन कर रही है और भविष्य में अतिरिक्त राफेल विमानों की खरीद को लेकर फ्रांस के साथ बातचीत जारी है। वहीं रूस ने भारत को Su-57 के निर्माण और तकनीक हस्तांतरण का प्रस्ताव भी दिया है। हालांकि दोनों देशों के साथ चल रही चर्चाओं पर अभी कोई अंतिम आधिकारिक निर्णय सामने नहीं आया है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत अपनी सामरिक जरूरतों और तकनीकी प्राथमिकताओं को ध्यान में रखते हुए भविष्य का फैसला करेगा।

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