उदयपुर UDA का अजीब फैसला: 20 KM दूर के 6 गांव बाहर, 35 KM दूर के गांव अब भी दायरे में
उदयपुर: उदयपुर विकास प्राधिकरण (UDA) की सीमा को लेकर ग्रामीणों में नाराजगी बढ़ रही है। शहर से करीब 20 किलोमीटर दूर स्थित छह गांवों को पंचायत चुनाव से पहले प्राधिकरण के दायरे से बाहर कर दिया गया, जबकि 30 से 35 किलोमीटर दूर के कई गांव अब भी UDA क्षेत्र में शामिल हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि इन इलाकों में विकास योजनाएं नहीं पहुंच रहीं, लेकिन जमीन के कन्वर्जन और निर्माण पर प्राधिकरण के नियम तथा शुल्क लागू हो रहे हैं। इससे छोटे निर्माण और बिल्डर्स की आवासीय योजनाएं प्रभावित हो रही हैं। ग्रामीणों ने सीमा निर्धारण के मापदंडों पर सवाल उठाते हुए कई अन्य गांवों को भी UDA से बाहर करने की मांग उठाई है।
20 किलोमीटर दूर के छह गांव UDA से बाहर
पंचायत चुनाव से पहले जनप्रतिनिधियों की मांग पर राज्य सरकार ने उदयपुर शहर से करीब 20 किलोमीटर दूर स्थित छह गांवों को UDA के दायरे से बाहर कर दिया था। इनमें ग्रामीण विधानसभा क्षेत्र के पोपल्टी, फांदा, अलसीगढ़ और उंदरीखुर्द तथा गोगुंदा विधानसभा क्षेत्र के भादवीगुड़ा और नयागुड़ा शामिल हैं।इन गांवों को बाहर करने के पीछे पहाड़ी बसावट और भौगोलिक परिस्थितियों का तर्क दिया गया था। इन इलाकों में बस्तियां अलग-अलग पहाड़ियों और मगरियों पर बसी हैं। ऐसे में यहां शहरी विकास की योजनाएं लागू करना कठिन बताया गया। साथ ही, आशंका जताई गई कि UDA का दायरा बढ़ने से जमीनों की खरीद-फरोख्त बढ़ सकती है और पहाड़ियों को काटकर निर्माण होने का खतरा पैदा हो सकता है।
30 से 35 किलोमीटर दूर के गांव अब भी UDA में शामिल
ग्रामीणों और बिल्डर्स का कहना है कि इसी तरह की भौगोलिक परिस्थितियों वाले कई दूरस्थ गांव अब भी UDA के दायरे में शामिल हैं। मावली, भटेवर और डबोक की ओर स्थित कुछ गांवों की दूरी शहर से 30 से 35 किलोमीटर तक बताई जा रही है।इन क्षेत्रों में कुछ जगह समतल जमीन है, जबकि कई इलाकों में पहाड़ी बसावट और अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियां हैं। ग्रामीणों का कहना है कि शहर से इतनी दूरी होने के कारण यहां सड़क, पार्क और अन्य नियोजित विकास सुविधाएं पहुंचाना चुनौतीपूर्ण है।ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि छह गांवों को बाहर करने के लिए जिन भौगोलिक मापदंडों का हवाला दिया गया, वे दूसरे दूरस्थ गांवों पर समान रूप से क्यों लागू नहीं किए गए। ग्रामीणों की मांग है कि UDA की सीमा तय करने के लिए स्पष्ट और समान मापदंड अपनाए जाएं।
पंचायतों के अधिकार सीमित, ग्रामीणों की बढ़ी परेशानी
ग्रामीणों के अनुसार, UDA क्षेत्र में शामिल होने के बाद संबंधित गांवों में पंचायतों के अधिकार सीमित या समाप्त हो गए हैं। दूसरी ओर, इन दूरदराज के इलाकों तक प्राधिकरण की विकास योजनाएं भी अपेक्षित रूप से नहीं पहुंच रही हैं।इससे ग्रामीणों के सामने छोटे निर्माण, जमीन के नियमन और स्थानीय जरूरतों से जुड़े काम करवाना मुश्किल हो गया है। उनका कहना है कि पहले पंचायत स्तर पर जिन कामों की प्रक्रिया आसान थी, अब उनके लिए प्राधिकरण के नियमों का पालन करना पड़ रहा है।ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासनिक व्यवस्था बदलने के बावजूद सड़क, पार्क और दूसरी बुनियादी सुविधाओं में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ। इससे उन्हें दोहरी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
कृषि भूमि के कन्वर्जन पर बढ़ा खर्च
UDA क्षेत्र में शामिल होने के बाद कृषि भूमि को गैर-कृषि उपयोग में बदलवाने की प्रक्रिया पहले की तुलना में कठिन और महंगी होने की शिकायतें सामने आ रही हैं। ग्रामीणों का कहना है कि सरकारी शुल्क के अलावा अन्य खर्च भी बढ़ गए हैं।कुछ मामलों में जमीन के 50 प्रतिशत हिस्से के कन्वर्जन की बात कही जा रही है। इससे जमीन की लागत और उसके उपयोग की संभावनाएं प्रभावित हो रही हैं। बिल्डर्स का कहना है कि बढ़े हुए खर्च के कारण कई आवासीय योजनाएं आर्थिक रूप से व्यवहारिक नहीं रह गई हैं।बताया जा रहा है कि कुछ बिल्डर्स ने अपनी योजनाएं निरस्त कर दी हैं, जबकि कई जमीनें अब भी कृषि उपयोग में पड़ी हैं। हालांकि, कन्वर्जन की शर्तों और शुल्क की वास्तविक स्थिति संबंधित नियमों तथा मामलों के दस्तावेजों से स्पष्ट होगी।
बिलानाम जमीनों को रिकॉर्ड में दर्ज करने पर भी सवाल
UDA क्षेत्र में शामिल किए गए गांवों की जमीनों के राजस्व रिकॉर्ड को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि सरकारी आदेश जारी होने के बाद इन गांवों की बिलानाम जमीनों को पर्याप्त मौके के सर्वे के बिना प्राधिकरण के रिकॉर्ड में दर्ज कर लिया गया।ग्रामीणों का कहना है कि राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज स्थिति और मौके पर जमीन की वास्तविक स्थिति में अंतर हो सकता है। यदि किसी कृषि भूमि पर पहले से मकान या दुकान बनी हुई है और इसकी शिकायत UDA तक पहुंचती है, तो संबंधित व्यक्ति को कार्रवाई और नियमन की प्रक्रिया का सामना करना पड़ सकता है।इस मुद्दे पर मौके का सर्वे, राजस्व रिकॉर्ड और जमीन के वास्तविक उपयोग का मिलान जरूरी है। संबंधित दस्तावेजों और आधिकारिक प्रक्रिया की जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि रिकॉर्ड में दर्ज जमीनों की स्थिति क्या है।
छह अन्य गांवों को भी UDA से बाहर करने की मांग
नाथद्वारा रोड की ओर स्थित छह गांवों को भी UDA के दायरे से बाहर करने की मांग उठी थी। इनमें कैलाशपुरी, चीरवा, सरेकला, सरेखुर्द, रामा और झिंडोली शामिल हैं। ये गांव शहर से करीब 25 किलोमीटर के दायरे में बताए जाते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि इन इलाकों में भी पहाड़ी बसावट है और बस्तियां अलग-अलग स्थानों पर फैली हुई हैं।इन गांवों को बाहर करने की मांग पर अब तक निर्णय नहीं होने से स्थानीय लोगों में नाराजगी है। उनका कहना है कि UDA में शामिल रहने के कारण पंचायतों के अधिकार सीमित हुए हैं और ग्रामीणों को जटिल नियमों तथा भारी शुल्कों का सामना करना पड़ रहा है।
पेराफेरी जिला संघर्ष समिति ने उठाए सवाल
पेराफेरी जिला संघर्ष समिति, उदयपुर के संयोजक चंदन सिंह देवड़ा ने कहा कि UDA के विस्तार में समान मापदंडों का ध्यान नहीं रखा गया। उन्होंने सरे, झिंडोली, रामा, कैलाशपुरी, मंदेसर और खेमली जैसे दूरस्थ गांवों को भी प्राधिकरण के दायरे से बाहर करने की मांग की।देवड़ा के अनुसार, पेराफेरी क्षेत्र में पंचायतों के अधिकार खत्म होने से ग्रामीणों की मुश्किलें बढ़ी हैं। उनका आरोप है कि कन्वर्जन से होने वाली आय UDA को मिल रही है, लेकिन इन गांवों में विकास कार्य नहीं हो रहे। उन्होंने पेराफेरी की पंचायतों के लिए विशेष बजट जारी करने की मांग भी उठाई।
UDA सीमा और ग्रामीण विकास पर फैसला अहम
उदयपुर में UDA की सीमा को लेकर उठे सवाल अब ग्रामीणों की बुनियादी सुविधाओं, जमीन के नियमन और पंचायतों के अधिकारों से जुड़ गए हैं। एक ओर छह गांवों को भौगोलिक परिस्थितियों के आधार पर बाहर किया गया, वहीं दूसरी ओर समान परिस्थितियों वाले दूरस्थ गांव अब भी प्राधिकरण क्षेत्र में शामिल हैं।ग्रामीणों की मांग है कि सीमा निर्धारण के मापदंड सार्वजनिक किए जाएं और प्रभावित गांवों की वास्तविक स्थिति का सर्वे कराया जाए। साथ ही, जिन क्षेत्रों में पंचायतों के अधिकार सीमित हुए हैं, वहां विकास और नागरिक सुविधाओं की जिम्मेदारी भी स्पष्ट की जाए। अब इस पूरे मामले में UDA और राज्य सरकार का आधिकारिक पक्ष तथा आगे की कार्रवाई महत्वपूर्ण होगी।