उदयपुर में कैंसर की दवा के लिए नई नैनो तकनीक विकसित, शोध को मिला पेटेंट
उदयपुर के मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने कैंसर की दवा मुंह से देने के लिए विशेष ‘ओरल नैनो-फॉर्मूलेशन’ तकनीक विकसित की है। फार्मेसी विभाग की प्रोफेसर डॉ. गरिमा जोशी और उनके शोधार्थी शेख शहनवाज कादिर ने यह शोध किया है। तकनीक के लिए शोध टीम को पेटेंट भी मिला है। शुरुआती प्रयोगशाला और पशु परीक्षणों में दवा के अवशोषण में सुधार के संकेत मिले हैं। हालांकि, यह तकनीक अभी शोध के चरण में है। मरीजों में इसकी सुरक्षा और प्रभावशीलता साबित करने के लिए क्लीनिकल ट्रायल जरूरी होंगे।
अग्नाशय के कैंसर पर केंद्रित रहा शोध
मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय के फार्मेसी विभाग की टीम ने मुख्य रूप से अग्नाशय यानी पैंक्रियाटिक कैंसर के उपचार में इस्तेमाल होने वाली दवा पर शोध किया।प्रोफेसर डॉ. गरिमा जोशी और शोधार्थी शेख शहनवाज कादिर ने ऐसी तकनीक विकसित करने पर काम किया, जिससे दवा को मुंह के जरिए दिया जा सके और शरीर में उसका अवशोषण बेहतर हो।शोध टीम के अनुसार, शुरुआती परीक्षणों में नए फॉर्मूलेशन के परिणाम उत्साहजनक रहे हैं। इस तकनीक के लिए पेटेंट मिलना शोध की महत्वपूर्ण उपलब्धि है। हालांकि, पेटेंट मिलने का अर्थ यह नहीं है कि तकनीक मरीजों के इलाज के लिए पूरी तरह स्वीकृत हो गई है।
दवा के अवशोषण में 165 प्रतिशत से अधिक सुधार का दावा
शोध के दौरान सामान्य दवा की तुलना में नए नैनो-फॉर्मूलेशन के अवशोषण में 165 प्रतिशत से अधिक सुधार दर्ज होने की जानकारी दी गई है।इसके अलावा, कैंसर कोशिकाओं पर किए गए परीक्षणों में 31.4 प्रतिशत तक एपोप्टोटिक प्रभाव देखा गया। एपोप्टोसिस वह प्रक्रिया है, जिसमें कोशिकाएं नियंत्रित तरीके से नष्ट होती हैं।ये परिणाम शुरुआती प्रयोगों से जुड़े हैं। इन्हें मरीजों में उपचार की सफलता का प्रमाण नहीं माना जा सकता। आगे के परीक्षणों से यह पता लगाना होगा कि तकनीक मनुष्यों में कितनी सुरक्षित और प्रभावी है।
पैक्लिटैक्सेल को नैनो-फॉर्मूलेशन में किया गया तैयार
डॉ. गरिमा जोशी के अनुसार, इस शोध की शुरुआत वर्ष 2021 में राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान (रूसा) के तहत मिले शोध प्रोजेक्ट से हुई थी। इसके लिए आधुनिक उपकरणों से युक्त नैनो-फॉर्मूलेशन रिसर्च लैब भी स्थापित की गई।शोध में कैंसर की दवा पैक्लिटैक्सेल को फॉस्फेटिडिलकोलीन की विशेष दोहरी परत में तैयार किया गया। इसका उद्देश्य आंतों की बाधाओं को पार कर दवा के अवशोषण को बेहतर बनाना है।नैनो-फॉर्मूलेशन तकनीक में दवा को विशेष संरचना में तैयार किया जाता है, ताकि उसके शरीर में पहुंचने और अवशोषित होने के तरीके में सुधार किया जा सके। इस शोध में भी इसी सिद्धांत पर काम किया गया है।
मरीजों तक पहुंचने से पहले क्लीनिकल ट्रायल जरूरी
शोध टीम के अनुसार, तकनीक अभी प्रयोगशाला और पशु परीक्षणों के स्तर पर है। इसे मरीजों के उपचार में इस्तेमाल करने से पहले मानव परीक्षणों के जरिए इसकी सुरक्षा, प्रभावशीलता और उचित खुराक का आकलन करना होगा।इसलिए फिलहाल इसे कीमोथेरेपी या रेडिएशन का स्थापित विकल्प नहीं माना जा सकता। कैंसर के मरीजों को अपने डॉक्टर की सलाह के बिना मौजूदा उपचार बंद नहीं करना चाहिए।यदि आगे के परीक्षण सफल रहते हैं और नियामकीय मंजूरी मिलती है, तो यह तकनीक भविष्य में दवा देने के अधिक सुविधाजनक तरीके के विकास में मदद कर सकती है।
शोध को मिला अंतरराष्ट्रीय मंच
शोधार्थी शेख शहनवाज कादिर को इस परियोजना के लिए ब्रिटेन की कॉमनवेल्थ स्प्लिट-साइट फेलोशिप मिली। उन्होंने लिवरपूल विश्वविद्यालय में प्रोफेसर इमरान सलीम के मार्गदर्शन में अपने पीएचडी शोध का एक हिस्सा पूरा किया।शोध को ऑस्ट्रिया की ग्राज यूनिवर्सिटी में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भी प्रस्तुत किया गया। इससे शोध टीम को अपने काम को अंतरराष्ट्रीय अकादमिक मंच पर साझा करने का अवसर मिला।
राजस्थान में कैंसर अनुसंधान के लिए महत्वपूर्ण पहल
उदयपुर के मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय में विकसित यह तकनीक कैंसर की दवाओं को बेहतर तरीके से शरीर तक पहुंचाने के शोध प्रयासों का हिस्सा है।इसके शुरुआती परिणाम आगे के अनुसंधान के लिए उपयोगी हो सकते हैं। हालांकि, वास्तविक चिकित्सकीय लाभ का पता क्लीनिकल ट्रायल और नियामकीय मूल्यांकन के बाद ही चलेगा।फिलहाल इस शोध की प्रमुख उपलब्धि नई दवा वितरण तकनीक का विकास और उसके लिए पेटेंट मिलना है। अब आगे के परीक्षण यह तय करेंगे कि इसका इस्तेमाल मरीजों के उपचार में किस तरह किया जा सकता है।