असम में यूसीसी विधेयक पास: तीसरा राज्य बना, क्या है समान नागरिक संहिता और क्यों होता रहा है इसका विरोध?
गुवाहाटी। असम विधानसभा ने बुधवार, 2026 को समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code – UCC) विधेयक को ध्वनिमत से पारित कर दिया। इसके साथ ही असम, उत्तराखंड और गुजरात के बाद यूसीसी लागू करने वाला देश का तीसरा राज्य बन गया है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा की सरकार ने इसे अपना प्रमुख चुनावी वादा बताया था और पहली ही कैबिनेट बैठक में इसके मसौदे को मंजूरी दे दी थी।
क्या है यूसीसी?
समान नागरिक संहिता (UCC) का मतलब है कि देश के सभी नागरिकों के लिए व्यक्तिगत मामलों—जैसे विवाह, तलाक, गोद लेना, उत्तराधिकार और संपत्ति—में एक समान कानून लागू हो, चाहे उनका धर्म कोई भी हो। वर्तमान में भारत में ये विषय अलग-अलग धर्मों के पर्सनल लॉ के अनुसार चलते हैं, जैसे हिंदू कानून, मुस्लिम पर्सनल लॉ आदि।
यूसीसी लागू होने पर इन सभी मामलों में एक ही कानून लागू होगा, जिससे कानूनी समानता और लैंगिक न्याय को बढ़ावा देने का उद्देश्य है।
असम यूसीसी विधेयक की प्रमुख बातें
असम में पारित विधेयक में कई अहम प्रावधान किए गए हैं—
बहुविवाह पर पूरी तरह रोक
लिव-इन रिलेशनशिप का पंजीकरण अनिवार्य
पंजीकरण न कराने पर 3 महीने तक की सजा
बहुविवाह या द्विविवाह पर 7 साल तक की जेल का प्रावधान
विवाह, तलाक और उत्तराधिकार में सभी धर्मों के लिए समान नियम
अनुसूचित जनजातियों को कानून के दायरे से बाहर रखा गया है
मुख्यमंत्री सरमा ने कहा कि यह कानून असम की सामाजिक और जनसांख्यिकीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। उन्होंने इसे महिलाओं के अधिकार, बेटियों को संपत्ति में समान हिस्सेदारी और सामाजिक सुधार की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया।
सदन में हंगामा और विपक्ष का विरोध
विधानसभा में पूरे दिन चली चर्चा के बाद शोर-शराबे के बीच विधेयक पारित हुआ। विपक्षी दलों ने इसे जल्दबाजी में लाया गया कानून बताते हुए चयन समिति के पास भेजने की मांग की, जिसे विधानसभा अध्यक्ष रंजीत कुमार दास ने खारिज कर दिया। इसके बाद विपक्षी सदस्यों ने नारेबाजी करते हुए विरोध जताया।
सत्ता पक्ष के सदस्य ‘भारत माता की जय’ और ‘जय श्रीराम’ के नारे लगाते रहे, जबकि विपक्ष ने इस कानून के सामाजिक प्रभाव और समय को लेकर गंभीर सवाल उठाए।
यूसीसी पर देश में कब और क्यों शुरू हुआ विवाद?
यूसीसी का मुद्दा भारत में नया नहीं है। यह संविधान के नीति निदेशक तत्वों (Directive Principles) के तहत अनुच्छेद 44 में उल्लेखित है, जिसमें राज्य को समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास करने की बात कही गई है।
हालांकि, इसे लागू करने को लेकर लंबे समय से बहस और विवाद चलता रहा है।
यूसीसी के विरोध के पीछे कई तर्क दिए जाते हैं— विरोधियों का आरोप है धार्मिक स्वतंत्रता का सवाल खड़े हो रहे है ,
विरोध करने वाले मानते हैं कि अलग-अलग धर्मों के अपने पर्सनल लॉ होते हैं, और यूसीसी लागू करने से धार्मिक स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है सांस्कृतिक विविधता पर असर होगा ,भारत एक बहुसांस्कृतिक देश है, जहां अलग-अलग समुदायों की परंपराएं और रीति-रिवाज हैं। यूसीसी से इन पर असर पड़ने की आशंका जताई जाती है।
राजनीतिक और समय का मुद्दा ,
विपक्ष अक्सर आरोप लगाता रहा है कि यूसीसी को राजनीतिक लाभ के लिए चुनावी मुद्दा बनाया जाता है और इसे लागू करने की जल्दबाजी की जाती है।
अल्पसंख्यक समुदायों की चिंता
खासतौर पर मुस्लिम समुदाय के कुछ संगठनों ने इसे अपने पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप बताया है।
समर्थन में क्या तर्क दिए जाते हैं?
वहीं, यूसीसी के समर्थक इसे—
लैंगिक समानता (Gender Equality)महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षाकानूनी एकरूपता और सामाजिक सुधार के लिए जरूरी बताते हैं।
असम में यूसीसी विधेयक का पारित होना देश में इस बहस को फिर से तेज कर सकता है। जहां एक ओर इसे सामाजिक सुधार और समानता की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इसके सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं। आने वाले समय में अन्य राज्यों और केंद्र स्तर पर भी इस मुद्दे पर राजनीतिक और कानूनी चर्चा और तेज होने की संभावना है।