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सरिस्का की वादियों में गूंजा आस्था का स्वर, भर्तृहरि धाम में वैशाख अष्टमी पर सजा श्रद्धा का मेला , उज्जैन के महराजा ने राजपाट छोड़ अलवर में ली समाधि

अलवर जिले की पवित्र धरती पर स्थित भर्तृहरि धाम में वैशाख माह की अष्टमी के अवसर पर पारंपरिक छोटे मेले का आयोजन भक्ति और उल्लास के साथ सम्पन्न हुआ। सरिस्का की शांत वादियों में बसे इस प्राचीन तपोस्थल पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे और लोकदेवता महाराजा भर्तृहरि के दर्शन कर मनोकामनाएं मांगी। धार्मिक आस्था, सेवा भाव और सुव्यवस्थित व्यवस्थाओं के बीच यह आयोजन श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिक अनुभव बन गया।

आस्था का केंद्र बना भर्तृहरि धाम, श्रद्धालुओं का उमड़ा सैलाब

अलवर के सरिस्का क्षेत्र में स्थित भर्तृहरि धाम एक प्रमुख धार्मिक स्थल के रूप में अपनी अलग पहचान रखता है। वैशाख अष्टमी के अवसर पर आयोजित छोटे मेले में दूर-दराज से श्रद्धालु बड़ी संख्या में पहुंचे और बाबा भर्तृहरि के दरबार में हाजिरी लगाई। लोकदेवता के रूप में पूजित भर्तृहरि के प्रति लोगों की गहरी आस्था साफ देखने को मिली। मंदिर परिसर में भक्तों की लंबी कतारें लगी रहीं और हर कोई शांतिपूर्वक दर्शन कर अपनी मनोकामनाएं पूरी होने की कामना करता नजर आया।

अमर ज्योत के दर्शन बने विशेष आकर्षण का केंद्र

भर्तृहरि धाम में प्रज्वलित अमर ज्योत श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का प्रतीक है, जो निरंतर जलती रहती है। वैशाख मेले के दौरान इस ज्योत के दर्शन के लिए भक्तों में खास उत्साह देखने को मिला। श्रद्धालु मानते हैं कि इस ज्योत के दर्शन करने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और सुख-शांति का संचार होता है। मंदिर परिसर में धार्मिक वातावरण और भक्ति संगीत के बीच श्रद्धालु आध्यात्मिक अनुभूति में डूबे नजर आए।

सेवा और समर्पण का उदाहरण बने भंडारे और प्याऊ

मेले के दौरान विभिन्न सामाजिक संगठनों और सेवाभावी लोगों द्वारा श्रद्धालुओं के लिए जगह-जगह भंडारों और ठंडे पानी की प्याऊ की व्यवस्था की गई। गर्मी के मौसम को देखते हुए यह सेवा श्रद्धालुओं के लिए काफी राहत भरी रही। भक्तों को भोजन और जल की सुविधा सहज रूप से मिलती रही, जिससे आयोजन में सेवा और सहयोग की भावना साफ झलकी। यह पहल न केवल मानवीय संवेदनाओं का उदाहरण बनी, बल्कि मेले की गरिमा को भी बढ़ाती नजर आई।

सुरक्षा और व्यवस्था में प्रशासन रहा पूरी तरह मुस्तैद

श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या को देखते हुए स्थानीय प्रशासन और पुलिस बल पूरी तरह सतर्क नजर आया। मेले के दौरान सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद रही और भीड़ नियंत्रण के लिए विशेष इंतजाम किए गए। पुलिसकर्मी लगातार निगरानी करते रहे, जिससे किसी भी प्रकार की अव्यवस्था या अप्रिय घटना की स्थिति उत्पन्न नहीं हुई। प्रशासन की सजगता के कारण श्रद्धालुओं ने सुरक्षित और व्यवस्थित माहौल में दर्शन किए।

तपस्या की भूमि से लोकआस्था तक, भर्तृहरि की अद्भुत कथा

मान्यता है कि उज्जैन के राजा भर्तृहरि ने सांसारिक मोह त्यागकर वैराग्य का मार्ग अपनाया और सरिस्का की पहाड़ियों में आकर कठोर तपस्या की। पत्नी के वियोग के बाद उन्होंने राजपाट छोड़ दिया और अंततः इसी स्थान पर समाधि में लीन हो गए। आज वही स्थान भर्तृहरि धाम के रूप में प्रसिद्ध है, जहां देशभर से श्रद्धालु अपनी आस्था और विश्वास के साथ पहुंचते हैं। यह स्थल न केवल धार्मिक, बल्कि ऐतिहासिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है।

भादो का मेला अधिक भव्य, वैशाख में मिलती है सहज दर्शन की सुविधा

मंदिर के महंतों के अनुसार, भर्तृहरि धाम में वर्ष में दो बार मेले आयोजित होते हैं—एक वैशाख में और दूसरा भाद्रपद (भादो) माह में। वैशाख का मेला परंपरागत रूप से छोटा माना जाता है, जबकि भादो में लगने वाला मेला अधिक भव्य और विशाल होता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि वैशाख मेले में अपेक्षाकृत कम भीड़ होने के कारण श्रद्धालुओं को आसानी से दर्शन का लाभ मिलता है और व्यवस्थाएं भी अधिक सुचारू रहती हैं। यह समय शांतिपूर्ण और सुकून भरे दर्शन के लिए उपयुक्त माना जाता है।

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