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48 साल से अटकी अलवर की 750 करोड़ की जमीन, नहीं बस सकीं नई कॉलोनियां

अलवर शहर में शहरी विकास की एक बड़ी योजना पिछले करीब 48 वर्षों से अधर में लटकी हुई है। करीब 50 बीघा बेशकीमती भूमि आज भी खाली पड़ी है, जबकि इस पर सैकड़ों नए आवास विकसित किए जा सकते थे। मुआवजा विवाद, प्रशासनिक देरी और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण यह जमीन अब तक आम लोगों के उपयोग में नहीं आ सकी है।

750 करोड़ की जमीन अब भी विकास की राह देख रही

अलवर शहर में करीब 50 बीघा भूमि पिछले कई दशकों से खाली पड़ी हुई है, जिसका बाजार मूल्य 750 करोड़ रुपये से अधिक आंका जा रहा है। यह भूमि शहरी विकास योजनाओं के तहत आवासीय विस्तार के लिए अधिग्रहित की गई थी, लेकिन विभिन्न कारणों से इसका उपयोग नहीं हो सका। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द समाधान नहीं निकाला गया तो इस भूमि पर अतिक्रमण का खतरा बढ़ सकता है। शहर के विस्तार और आवासीय जरूरतों को देखते हुए यह जमीन महत्वपूर्ण मानी जाती है, लेकिन अब तक इसका लाभ आम नागरिकों को नहीं मिल पाया है।

1978 में हुआ अधिग्रहण, विवाद आज भी बरकरार

विजय नगर, बुद्ध विहार, स्कीम नंबर-10 और पंचवटी जैसी कॉलोनियों के विकास के लिए वर्ष 1978 में सात कुओं क्षेत्र की 160 हेक्टेयर से अधिक भूमि अधिग्रहित की गई थी। अधिकांश खातेदारों ने भूमि देने पर सहमति जताई, लेकिन करीब 110 खातेदारों ने मुआवजे को लेकर आपत्ति दर्ज कराते हुए न्यायालय का रुख किया। न्यायिक प्रक्रिया में भी मुआवजे के निर्धारण का मुद्दा प्रमुख रहा। समय-समय पर बैठकें हुईं, लेकिन अब तक कोई सर्वसम्मत समाधान नहीं निकल पाया, जिसके कारण भूमि का बड़ा हिस्सा अनुपयोगी बना हुआ है।

कॉलोनियों के विस्तार पर लगा ब्रेक

भूमि विवाद के कारण शहर की कई प्रमुख आवासीय योजनाओं का विस्तार रुक गया है। वर्तमान में इन कॉलोनियों में हजारों परिवार निवास कर रहे हैं, लेकिन अतिरिक्त भूमि उपलब्ध नहीं होने से नई आवासीय सुविधाओं का विकास संभव नहीं हो पा रहा। शहरीकरण की बढ़ती जरूरतों के बीच यह स्थिति विकास कार्यों के लिए बड़ी चुनौती बन गई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि भूमि विवाद सुलझ जाए तो क्षेत्र में बेहतर आवासीय और आधारभूत सुविधाओं का विस्तार किया जा सकता है।

500 नए आवासों की संभावना अटकी

विशेषज्ञों के अनुसार खाली पड़ी करीब 50 बीघा भूमि का निस्तारण होने पर यहां 500 से अधिक नए आवास विकसित किए जा सकते हैं। इससे न केवल शहर में आवासीय दबाव कम होगा, बल्कि सरकार और विकास एजेंसियों को भी राजस्व प्राप्त होगा। वर्तमान में इन योजनाओं के अंतर्गत चार हजार से अधिक आवास पहले से मौजूद हैं। ऐसे में अतिरिक्त भूमि का उपयोग भविष्य की जरूरतों को पूरा करने में अहम भूमिका निभा सकता है।

रोहिणी और साकेत कॉलोनी का मामला भी वर्षों से लंबित

अलवर में रोहिणी और साकेत कॉलोनी जैसी अन्य आवासीय योजनाएं भी लंबे समय से अधूरी पड़ी हैं। वर्ष 1998 से प्रस्तावित इन परियोजनाओं के लिए लगभग 1200 बीघा भूमि चिन्हित की गई थी, लेकिन मुआवजा और स्वीकृति संबंधी प्रक्रियाएं पूरी नहीं हो सकीं। परिणामस्वरूप वर्षों बाद भी ये योजनाएं कागजों तक सीमित हैं। जानकारों का मानना है कि यदि प्रशासनिक स्तर पर ठोस पहल हो तो शहर को नई कॉलोनियों और बेहतर शहरी ढांचे का लाभ मिल सकता है।

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