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अरावली पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, खनन पर रोक और नई समिति का गठन

देश की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में शामिल अरावली को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है। अदालत ने अरावली पर्वतमाला की वैज्ञानिक और एक समान परिभाषा तय करने के लिए पांच सदस्यीय विशेषज्ञ समिति गठित की है। समिति को 31 अगस्त 2026 तक अपनी रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया गया है। रिपोर्ट आने तक अरावली क्षेत्र में खनन गतिविधियों पर रोक जारी रहेगी। अदालत का मानना है कि पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए ठोस वैज्ञानिक आधार पर निर्णय लिया जाना आवश्यक है।

अरावली की स्पष्ट परिभाषा तय करेगी विशेषज्ञ समिति

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि अरावली पर्वतमाला की सीमाओं और स्वरूप को लेकर लंबे समय से अलग-अलग व्याख्याएं सामने आती रही हैं। इसी वजह से खनन, निर्माण और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े मामलों में विवाद उत्पन्न होते रहे हैं। अदालत ने अब विशेषज्ञों की एक समिति गठित कर इस विषय पर व्यापक अध्ययन कराने का फैसला लिया है। समिति अरावली की भौगोलिक, पारिस्थितिक और वैज्ञानिक विशेषताओं का मूल्यांकन करेगी तथा एक ऐसी परिभाषा सुझाएगी जो भविष्य में नीति निर्माण और न्यायिक फैसलों का आधार बन सके।

पांच विशेषज्ञों को सौंपी गई बड़ी जिम्मेदारी

अदालत द्वारा गठित पांच सदस्यीय समिति की अध्यक्षता भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (आईसीएफआरई) की महानिदेशक कंचन देवी करेंगी। उनके साथ वन, भूविज्ञान, पर्यावरण और पारिस्थितिकी के क्षेत्र के अनुभवी विशेषज्ञों को शामिल किया गया है। समिति में भारतीय वन सर्वेक्षण के पूर्व महानिदेशक डॉ. सुभाष आशुतोष, भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के पूर्व निदेशक डॉ. राजेंद्र कुमार शर्मा, पर्यावरण मंत्रालय के पूर्व संयुक्त सचिव बृज मोहन सिंह राठौर और दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रोफेसर अशोक के भटनागर शामिल हैं। यह टीम वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर अपनी सिफारिशें तैयार करेगी।

सभी पक्षों की राय लेकर तैयार होगी रिपोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने समिति को निर्देश दिया है कि वह केवल सरकारी आंकड़ों पर निर्भर न रहे, बल्कि अरावली से जुड़े सभी पक्षों से संवाद करे। इसके तहत राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली की राज्य सरकारों, पर्यावरणविदों, सामाजिक संगठनों, खनन पट्टा धारकों, परियोजना प्रस्तावकों, किसानों, ग्रामीणों और स्थानीय समुदायों से सुझाव लिए जाएंगे। अदालत का मानना है कि अरावली से लाखों लोगों की आजीविका जुड़ी हुई है, इसलिए किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले सभी हितधारकों के विचारों को शामिल करना जरूरी है।

पर्यावरण और विकास के बीच संतुलन पर जोर

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि भविष्य में उठाया जाने वाला हर कदम वैज्ञानिक अध्ययन और पर्यावरणीय सिद्धांतों के अनुरूप होना चाहिए। अदालत ने कहा कि समिति को ऐसे समाधान सुझाने होंगे जो प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के साथ-साथ विकास संबंधी आवश्यकताओं को भी ध्यान में रखें। न्यायालय ने यह भी कहा कि जल्दबाजी में लिया गया कोई निर्णय भविष्य में ऐसे परिणाम पैदा कर सकता है जिन्हें सुधारना मुश्किल हो जाए। इसलिए विस्तृत अध्ययन और सावधानीपूर्वक मूल्यांकन आवश्यक है।

रिपोर्ट आने तक खनन गतिविधियों पर रोक बरकरार

अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि समिति की अंतिम रिपोर्ट पर विचार होने तक अरावली क्षेत्र में खनन गतिविधियों पर रोक जारी रहेगी। यह फैसला पर्यावरण संरक्षण के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। लंबे समय से अरावली में अवैध और अनियंत्रित खनन को लेकर चिंताएं जताई जाती रही हैं। अब विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट के आधार पर भविष्य की नीति और कानूनी दिशा तय होगी। मामले की अगली सुनवाई 7 सितंबर को निर्धारित की गई है, जहां अदालत समिति की प्रगति और आगे की कार्रवाई पर विचार कर सकती है।

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