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इलाज बना मजबूरी, अंतिम विदाई में नहीं जा सके सुबोध मोहिते

दादा जनता के दिलों के राजा थे — भावुक हुए करीबी सहयोगी

गंभीर बीमारी ने रोका अंतिम दर्शन का रास्ता

पूर्व केंद्रीय मंत्री और दिवंगत अजित पवार के बेहद करीबी सहयोगी रहे सुबोध मोहिते गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के चलते अजित पवार के अंतिम दर्शन और अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हो सके। इस समय वे नागपुर के एक निजी अस्पताल में भर्ती हैं, जहां डॉक्टरों ने उनकी हालत को देखते हुए यात्रा की अनुमति देने से इनकार कर दिया।

बारामती जाने की बेचैनी, डॉक्टरों की मनाही

सुबोध मोहिते अजित पवार के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए लगातार प्रयासरत रहे, लेकिन स्वास्थ्य जोखिम को देखते हुए डॉक्टरों ने उन्हें डिस्चार्ज करने से मना कर दिया। बताया जा रहा है कि उन्हें एक जटिल सर्जरी से गुजरना है, जिसके कारण डॉक्टर किसी भी तरह का जोखिम लेने को तैयार नहीं हैं।

डॉक्टरों के फैसले से नाराज़ सुबोध मोहिते

करीबी सूत्रों के अनुसार, अजित पवार के असमय निधन से बेहद आहत सुबोध मोहिते डॉक्टरों के इस फैसले से खासे नाराज़ हैं। वे बार-बार अस्पताल स्टाफ से अनुमति की मांग कर रहे थे, लेकिन मेडिकल टीम उनकी स्थिति को देखते हुए अडिग रही।

राजनीति से परे था दोनों का रिश्ता

चौदहवीं लोकसभा के सदस्य रहे सुबोध मोहिते अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में भारी उद्योग मंत्री भी रह चुके हैं। अजित पवार के साथ उनके संबंध केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि पारिवारिक जैसे थे। दोनों नेताओं के बीच वर्षों पुरानी मित्रता और आपसी विश्वास की मिसालें राजनीति में कम ही देखने को मिलती हैं।

एक माह पहले नागपुर में हुई थी आखिरी मुलाकात

पिछले महीने दिसंबर में अजित पवार स्वयं नागपुर जाकर सुबोध मोहिते के घर पहुंचे थे। करीब एक घंटे तक दोनों नेताओं के बीच बातचीत हुई थी और साथ भोजन भी किया गया था। आज वही तस्वीरें सोशल मीडिया और इंटरनेट पर देखकर सुबोध मोहिते अस्पताल के बिस्तर पर शोक में डूबे हैं।

‘जनता के दिलों के राजा थे दादा’

Media Se बातचीत में सुबोध मोहिते ने अजित पवार के निधन पर गहरा दुख जताया। उन्होंने कहा,
“दादा जनता के दिलों के राजा थे। वे साफ-गोई, दिलदारी और अनोखे राजनीतिक अंदाज़ के लिए जाने जाते थे। महाराष्ट्र की राजनीति में उनकी कमी कभी पूरी नहीं हो सकती।”

नसीब पर अफसोस, अंतिम विदाई न दे पाने का दर्द

अंतिम संस्कार में शामिल न हो पाने को लेकर सुबोध मोहिते ने अपने नसीब पर अफसोस जताया। डॉक्टरों की अनुमति न मिलने से वे भीतर ही भीतर टूट चुके हैं। अस्पताल प्रशासन और इलाज कर रहे डॉक्टरों ने इस विषय पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है।


यह मामला सिर्फ एक नेता के अंतिम संस्कार में शामिल न हो पाने का नहीं, बल्कि राजनीति से परे एक गहरे मानवीय रिश्ते की पीड़ा को दर्शाता है। जहां एक ओर स्वास्थ्य सर्वोपरि है, वहीं दूसरी ओर एक करीबी मित्र को अंतिम विदाई न दे पाने का दर्द किसी भी इंसान को भीतर तक तोड़ सकता है। सुबोध मोहिते की व्यथा यह दिखाती है कि सत्ता और पद से ऊपर भी रिश्ते होते हैं, जिनकी अहमियत वक्त के साथ और गहरी हो जाती है।

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