Su-57 Vs F-35: क्या अमेरिकी जेट से पीछे है रूस का Su-57? विशेषज्ञों ने उठाए बड़े सवाल
रूस के पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट सुखोई Su-57 को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन जहां इसे दुनिया के सबसे उन्नत लड़ाकू विमानों में शामिल बताते हैं, वहीं कुछ रूसी सैन्य विशेषज्ञ इसकी वास्तविक क्षमताओं पर सवाल उठा रहे हैं। उनका मानना है कि ऑपरेशनल रिकॉर्ड और तकनीकी सीमाओं के कारण Su-57 की तुलना अमेरिकी F-35 से करना फिलहाल आसान नहीं है।
रूसी विशेषज्ञ ने पुतिन के दावों पर उठाए सवाल
रूस के रक्षा मामलों के जानकार मैक्सिम कलाश्निकोव ने Su-57 की प्रभावशीलता को लेकर खुलकर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि यदि यह विमान वास्तव में F-35 से बेहतर होता, तो यूक्रेन युद्ध में इसकी भूमिका कहीं अधिक दिखाई देती। विशेषज्ञों के मुताबिक, अमेरिकी F-35 ने विभिन्न सैन्य अभियानों में अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन किया है, जबकि Su-57 का इस्तेमाल सीमित स्तर तक ही देखने को मिला है। इसी कारण दोनों विमानों की तुलना को लेकर बहस लगातार तेज होती जा रही है।
तकनीकी क्षमताओं पर भी उठ रही हैं शंकाएं
कुछ रूसी सैन्य विश्लेषकों का मानना है कि Su-57 अभी भी उन सभी मानकों को पूरी तरह हासिल नहीं कर पाया है, जो किसी पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान के लिए आवश्यक माने जाते हैं। विशेषज्ञों ने इसके इंजन, एवियोनिक्स और स्टेल्थ तकनीक को लेकर सवाल उठाए हैं। उनका दावा है कि इन सीमाओं का असर रूस की हवाई रणनीति पर भी पड़ा है। हालांकि, रूस लगातार इस विमान के उन्नत संस्करणों और नई तकनीकों पर काम कर रहा है।
S-70 ओखोटनिक ड्रोन को माना जा रहा अहम सहयोगी
Su-57 के साथ काम करने के लिए विकसित किया गया S-70 ओखोटनिक ड्रोन रूस की भविष्य की हवाई रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। यह ड्रोन लड़ाकू विमान की सेंसर क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ अतिरिक्त हमला करने में भी मदद कर सकता है। माना जाता है कि इसकी स्टेल्थ तकनीक काफी उन्नत है, जिससे यह खतरनाक क्षेत्रों में भी सुरक्षित तरीके से मिशन पूरा करने में सक्षम हो सकता है। रूस इसे Su-57 के लिए ‘लॉयल विंगमैन’ की भूमिका में विकसित कर रहा है।
सीमित संख्या भी बनी बड़ी चुनौती
विशेषज्ञों के अनुसार Su-57 की सबसे बड़ी चुनौती इसकी कम संख्या है। रिपोर्टों के मुताबिक, वर्तमान में सीमित संख्या में ही ये विमान सक्रिय सेवा में मौजूद हैं। यूक्रेन युद्ध की शुरुआत के समय इनकी उपलब्धता और भी कम थी, जिसके चलते रूस ने इनका उपयोग बेहद सावधानी से किया। हालांकि, रूस का दावा है कि Su-57 का इस्तेमाल विशेष अभियानों में किया गया है, जिनमें हवाई लड़ाई, सटीक हमले और दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम को निशाना बनाना शामिल है।
भारत को भी दिया जा चुका है प्रस्ताव
रूस लंबे समय से भारत को Su-57 कार्यक्रम में शामिल होने का प्रस्ताव देता रहा है। मॉस्को ने तकनीक हस्तांतरण और ‘मेक इन इंडिया’ पहल के तहत उत्पादन में सहयोग की भी पेशकश की है। हालांकि, भारत की ओर से इस संबंध में अभी तक कोई आधिकारिक निर्णय सामने नहीं आया है। ऐसे में भविष्य में इस परियोजना को लेकर दोनों देशों के बीच क्या रुख अपनाया जाता है, इस पर रक्षा विशेषज्ञों की नजर बनी हुई है।