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लाल किले पर पहली बार गूंजेगा ‘वंदे मातरम’, जानिए क्या बदलेगा

नई दिल्ली। 15 अगस्त 2026 को लाल किले पर होने वाले स्वतंत्रता दिवस समारोह में एक महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिलेगा। आधिकारिक कार्यक्रम में पहली बार ध्वजारोहण से पहले ‘वंदे मातरम’ का औपचारिक गायन किया जाएगा। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की इस ऐतिहासिक रचना के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर समारोह के प्रोटोकॉल में यह बदलाव किया जा रहा है। अब तक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री के आगमन के बाद गार्ड ऑफ ऑनर, ध्वजारोहण, 21 तोपों की सलामी और राष्ट्रगान के बाद प्रधानमंत्री का संबोधन होता था। नए क्रम में ध्वजारोहण से पहले ‘वंदे मातरम’ का गायन होगा।

आजादी के बाद पहली बार बदलेगा प्रोटोकॉल

स्वतंत्रता दिवस के मुख्य समारोह में ‘वंदे मातरम’ को औपचारिक रूप से शामिल किया जाना इस साल का प्रमुख बदलाव है। रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने 10 अगस्त को नई दिल्ली में प्रेस ब्रीफिंग के दौरान इसकी जानकारी दी थी। यह फैसला ‘वंदे मातरम’ की रचना के 150 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में लिया गया है। इसके साथ ही लाल किले के आधिकारिक समारोह में राष्ट्रगीत को एक निर्धारित स्थान मिलेगा। हालांकि ‘वंदे मातरम’ लंबे समय से राष्ट्रीय भावना और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा रहा है, लेकिन स्वतंत्रता दिवस के इस आधिकारिक प्रोटोकॉल में इसे पहले इस तरह शामिल नहीं किया गया था।

‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगीत का दर्जा कैसे मिला?

संविधान सभा ने 24 जनवरी 1950 को ‘वंदे मातरम’ के शुरुआती दो अंतरों को राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार किया था। इसी अवसर पर ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान का दर्जा दिया गया। दोनों को समान सम्मान देने की बात कही गई थी। ‘वंदे मातरम’ का भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में विशेष महत्व रहा है और इसे देशभक्ति की भावना से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत की संवैधानिक स्थिति अलग-अलग है। स्वतंत्रता दिवस के आधिकारिक समारोह में अब तक राष्ट्रगान के गायन की परंपरा थी, जबकि राष्ट्रगीत के लिए कोई निर्धारित प्रोटोकॉल नहीं था।

ध्वजारोहण से पहले होगा राष्ट्रगीत का गायन

15 अगस्त 2026 से लाल किले के समारोह में कार्यक्रम का क्रम बदला जाएगा। उपलब्ध जानकारी के अनुसार प्रधानमंत्री के आगमन के बाद निर्धारित प्रोटोकॉल के तहत कार्यक्रम आगे बढ़ेगा और राष्ट्रीय ध्वज फहराने से पहले ‘वंदे मातरम’ का गायन किया जाएगा। इसके बाद ध्वजारोहण और 21 तोपों की सलामी समेत अन्य पारंपरिक कार्यक्रम होंगे। अंत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राष्ट्र को संबोधित करेंगे। इस बदलाव को ‘वंदे मातरम’ की 150वीं वर्षगांठ से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि समारोह के विस्तृत आधिकारिक प्रोटोकॉल की जानकारी के आधार पर ही अंतिम क्रम को देखा जाना चाहिए।

निमंत्रण पत्रों में भी शामिल किए गए छह मूल छंद

इस वर्ष के समारोह को विशेष बनाने के लिए रक्षा मंत्रालय ने आधिकारिक प्रिंट और डिजिटल निमंत्रण पत्रों में ‘वंदे मातरम’ के मूल छह छंद प्रकाशित किए हैं। इससे समारोह में शामिल होने वाले अतिथियों को पूरी मूल रचना देखने का अवसर मिलेगा। आम तौर पर सार्वजनिक रूप से ‘वंदे मातरम’ के शुरुआती हिस्से का ही अधिक इस्तेमाल होता है। निमंत्रण पत्रों में पूरी मूल रचना को शामिल करना इसके ऐतिहासिक और साहित्यिक महत्व को सामने लाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

150 साल पुरानी है ‘वंदे मातरम’ की रचना

‘वंदे मातरम’ की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 19वीं सदी में की थी। इसे आम तौर पर 1876 से जोड़ा जाता है और बाद में 1882 में प्रकाशित उनके उपन्यास ‘आनंदमठ’ में इसे शामिल किया गया। समय के साथ यह गीत भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में देशभक्ति और राष्ट्रीय चेतना का महत्वपूर्ण प्रतीक बन गया। 2026 में इसकी रचना के 150 वर्ष पूरे हो रहे हैं। इसी ऐतिहासिक अवसर को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने स्वतंत्रता दिवस के आधिकारिक समारोह में इसके औपचारिक गायन को शामिल करने का निर्णय लिया है।

‘वंदे मातरम’ को लेकर क्यों होती रही है बहस?

‘वंदे मातरम’ को लेकर समय-समय पर राजनीतिक और सामाजिक बहस भी होती रही है। इसके बावजूद स्वतंत्रता आंदोलन में इसकी भूमिका और राष्ट्रगीत के रूप में इसकी मान्यता स्थापित है। संविधान सभा ने इसके शुरुआती दो अंतरों को राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार किया था और ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान बनाया था। ऐसे में दोनों के सम्मान और निर्धारित प्रोटोकॉल को लेकर अलग-अलग समय पर चर्चा होती रही है। इस बार लाल किले के आधिकारिक समारोह में ‘वंदे मातरम’ को स्थान दिए जाने से यह विषय एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में आ गया है।

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Stv News Rajasthan

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