पंचायतीराज की 67 साल पुरानी कहानी: नागौर से शुरू हुआ गांवों तक सत्ता पहुंचाने का सफर
जयपुर। 2 अक्टूबर 1959 का दिन राजस्थान ही नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में भी महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी दिन नागौर की धरती से पंचायतीराज की तीन-स्तरीय व्यवस्था का उद्घाटन हुआ। प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने महात्मा गांधी की जयंती पर इस व्यवस्था की शुरुआत की थी।नागौर में दिए अपने भाषण में नेहरू ने कहा था कि देश में लोकतंत्र और पंचायतीराज की नींव रखी जा रही है। उन्होंने इसे गांधी की ग्राम स्वराज की सोच से भी जोड़ा।दरअसल, राजस्थान में गांव स्तर की पंचायतें इससे पहले ही काम कर रही थीं। 1953 के राजस्थान पंचायत अधिनियम के तहत ग्राम पंचायतों की व्यवस्था बनाई गई थी। इसके बाद 1959 के कानून ने ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद को जोड़कर तीन-स्तरीय ढांचा तैयार किया।
नागौर में क्यों चुना गया ऐतिहासिक दिन?
2 अक्टूबर का दिन महात्मा गांधी की जयंती था। नेहरू ने इसी दिन राजस्थान में लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की शुरुआत की।नागौर में अपने भाषण के दौरान उन्होंने गांधी को याद करते हुए कहा कि अगर गांधी जीवित होते तो इस कदम से उन्हें खुशी होती। नेहरू के मुताबिक गांवों के लोगों को केवल प्रशासन से सलाह लेने वाला नहीं, बल्कि जिम्मेदारी निभाने वाला बनाया जाना जरूरी था।यानी उद्देश्य केवल पंचायत बनाना नहीं था। कोशिश यह थी कि स्थानीय लोगों को अपने क्षेत्र के प्रशासन और विकास में वास्तविक भूमिका मिले।
पंचायतीराज से पहले गांवों में क्या था?
आज जिस पंचायतीराज व्यवस्था को हम जानते हैं, उसका ढांचा एक दिन में तैयार नहीं हुआ था।राजस्थान में 1953 के कानून के जरिए ग्राम पंचायतों की व्यवस्था शुरू की गई। इसके बाद 1957 में बलवंतराय मेहता समिति ने स्थानीय स्वशासन को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण सुझाव दिए।राजस्थान सरकार के दस्तावेजों के अनुसार, 1959 में राजस्थान पंचायत समितियां और जिला परिषद अधिनियम लागू हुआ। इसी के बाद ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद वाला तीन-स्तरीय ढांचा अस्तित्व में आया।
गांव की व्यवस्था की तीन बड़ी सीढ़ियां
नेहरू के नागौर भाषण में गांव के विकास को केवल प्रशासन तक सीमित नहीं रखा गया था। उन्होंने पंचायतों के साथ सहकारी संस्थाओं और शिक्षा को भी महत्वपूर्ण बताया।
पहली सीढ़ी: ग्राम पंचायत
ग्राम पंचायत को स्थानीय प्रशासन और रोजमर्रा के जनहित से जुड़े कामों में जिम्मेदारी दी जानी थी। यानी गांव के लोग अपने स्थानीय मामलों में ज्यादा सक्रिय भूमिका निभाएं।
दूसरी सीढ़ी: सहकारी संस्था
नेहरू ने सहकारी संस्थाओं को ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जोड़ा। उनका मानना था कि किसान और ग्रामीण आर्थिक गतिविधियों में मिलकर काम करें तो संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल हो सकता है।
तीसरी सीढ़ी: स्कूल
नेहरू के लिए शिक्षा भी गांव के विकास का आधार थी। उनका कहना था कि गांव का युवा सिर्फ नौकरी के लिए शहरों की ओर न जाए। शिक्षा ऐसी हो, जिससे वह अपने गांव के विकास में भी योगदान दे सके।
लोकतंत्र सिर्फ वोट डालने तक सीमित नहीं
1959 में नेहरू ने लोकतंत्र को केवल चुनाव और मतदान से आगे देखने की बात कही।उनकी सोच थी कि नागरिकों को राजनीतिक अधिकार मिलने के साथ उन्हें प्रशासनिक जिम्मेदारियों में भी भागीदारी मिलनी चाहिए। इसी विचार के तहत पंचायतों को अधिक जिम्मेदारी देने की कोशिश की गई।नेहरू ने यह भी कहा कि जिम्मेदारी लोगों को देने से ही वे जिम्मेदारी निभाना सीखेंगे। इसलिए सत्ता और प्रशासनिक जिम्मेदारियों का कुछ हिस्सा स्थानीय स्तर तक पहुंचाना जरूरी था।
नागौर के बाद पूरे देश में फैला मॉडल
राजस्थान का यह प्रयोग आगे चलकर देश के पंचायतीराज ढांचे के विकास में महत्वपूर्ण संदर्भ बना। राजस्थान सरकार भी नागौर को देश में तीन-स्तरीय पंचायतीराज की शुरुआत के प्रमुख ऐतिहासिक स्थल के रूप में दर्ज करती है।बाद में अलग-अलग राज्यों में स्थानीय स्वशासन की व्यवस्थाएं विकसित होती गईं। 1992 के 73वें संविधान संशोधन ने पंचायतीराज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा दिया। राजस्थान में इसके अनुरूप 1994 का पंचायतीराज कानून और 1996 के नियम लागू हुए।
आज वही व्यवस्था कितनी बड़ी हो चुकी है?
आज पंचायतीराज व्यवस्था केवल ग्राम पंचायत तक सीमित नहीं है। ग्राम पंचायत के ऊपर पंचायत समिति और जिला स्तर पर जिला परिषद काम करती है।राजस्थान सरकार के उपलब्ध आंकड़ों में राज्य के अलग-अलग जिलों में बड़ी संख्या में ग्राम पंचायतें और पंचायत समितियां दर्ज हैं। यानी 1959 में जिस विकेंद्रीकरण की शुरुआत नागौर से हुई थी, वह आज विशाल ग्रामीण प्रशासनिक ढांचे का हिस्सा है।
नागौर की उस ऐतिहासिक बैठक पर भी उठे थे सवाल
इतिहास का यह अध्याय केवल भाषण और उत्सव तक सीमित नहीं था। नेहरू के नागौर दौरे की तैयारियों को लेकर उस समय खर्च पर राजनीतिक सवाल भी उठे थे।हेलीपैड के विस्तार और डाक बंगले के सौंदर्यीकरण पर खर्च को लेकर आपत्ति जताई गई थी। तत्कालीन राजनीतिक बहस में यह सवाल भी उठा कि प्रधानमंत्री को सड़क मार्ग से नागौर क्यों नहीं लाया जा सकता।आपके उपलब्ध स्रोत में हेलीपैड के लिए 85 हजार रुपये और डाक बंगले के लिए 76,700 रुपये के प्रावधान का उल्लेख है। हालांकि इस पुराने खर्च संबंधी विवरण की स्वतंत्र प्राथमिक स्रोत से पुष्टि उपलब्ध नहीं हो सकी, इसलिए इसे उस समय की राजनीतिक बहस के रूप में ही देखना उचित है।
2 अक्टूबर 1959 से आज तक
नागौर में 2 अक्टूबर 1959 को शुरू हुआ यह प्रयोग भारतीय लोकतंत्र की उस सोच से जुड़ा था, जिसमें शासन को जनता के ज्यादा करीब लाने की कोशिश की गई।आज पंचायतों में चुनाव होते हैं, ग्राम सभाएं होती हैं और गांव के विकास से जुड़े फैसलों में स्थानीय प्रतिनिधियों की भूमिका रहती है। 1959 में नेहरू ने जिस जिम्मेदारी को गांवों तक पहुंचाने की बात कही थी, वह आज संविधान से संरक्षित स्थानीय स्वशासन की व्यवस्था का हिस्सा है।नागौर की धरती पर 2 अक्टूबर 1959 को हुआ वह आयोजन इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि उसी दिन राजस्थान में लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण को एक व्यापक संस्थागत रूप देने की शुरुआत हुई थी।