पाकिस्तान में भी निकली भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा, कराची की सड़कों पर गूंजे ‘हरे कृष्ण’ के जयकारे
भारत के साथ-साथ पाकिस्तान के कराची शहर में भी भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा श्रद्धा और उत्साह के साथ निकाली गई। सिंध प्रांत में आयोजित इस धार्मिक शोभायात्रा में हिंदू समुदाय के सैकड़ों श्रद्धालुओं ने भाग लिया। भजन-कीर्तन, जयकारों और फूलों से सजे रथ के साथ निकली यात्रा ने कराची की सड़कों पर धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक परंपरा की अनूठी झलक पेश की।
श्रद्धालुओं ने पूरे उत्साह से निकाली रथयात्रा
कराची में आयोजित भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए। भक्त फूलों से सजे रथ को खींचते हुए ‘हरे कृष्ण’ के भजन गाते और नृत्य करते नजर आए। यात्रा के दौरान धार्मिक उल्लास का माहौल देखने को मिला। रास्ते में मौजूद लोगों ने भी इस शोभायात्रा को उत्सुकता से देखा। आयोजन के दौरान श्रद्धालुओं के हाथों में पाकिस्तान का राष्ट्रीय ध्वज भी दिखाई दिया, जो स्थानीय सामाजिक सहभागिता का प्रतीक माना गया।
श्री स्वामीनारायण मंदिर से निकलती है मुख्य शोभायात्रा
कराची में भगवान जगन्नाथ की यह वार्षिक रथयात्रा शहर के ऐतिहासिक श्री स्वामीनारायण मंदिर से शुरू होती है। इस आयोजन में आसपास के मंदिरों और हिंदू समाज के लोग भी शामिल होते हैं। रथयात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ की पूजा-अर्चना, भजन-कीर्तन और धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं। यह आयोजन पाकिस्तान में रहने वाले हिंदू समुदाय की धार्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए रखने का महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता है।
140 वर्ष पुराना है कराची का ऐतिहासिक मंदिर
कराची का श्री स्वामीनारायण मंदिर शहर की मोहम्मद अली जिन्ना रोड पर स्थित है और इसका इतिहास लगभग 140 वर्षों से अधिक पुराना है। यह पाकिस्तान के प्रमुख हिंदू धार्मिक स्थलों में से एक माना जाता है। वर्ष 1947 के विभाजन के दौरान यह मंदिर भारत जाने वाले शरणार्थियों के लिए अस्थायी शिविर के रूप में भी उपयोग में आया था। ऐतिहासिक महत्व के कारण यह मंदिर आज भी धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से विशेष स्थान रखता है।
हर साल परंपरा के साथ मनाया जाता है आयोजन
पाकिस्तान में रहने वाला हिंदू समुदाय हर वर्ष भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा सहित कई प्रमुख धार्मिक पर्व पारंपरिक तरीके से मनाता है। रथयात्रा के वीडियो अक्सर सोशल मीडिया पर भी चर्चा का विषय बनते हैं। यह आयोजन न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह दर्शाता है कि सीमित संख्या में होने के बावजूद वहां का हिंदू समुदाय अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं को संरक्षित रखने का प्रयास लगातार करता आ रहा है।