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‘वंदे मातरम’ विवाद पर भड़के ओवैसी, बोले- राष्ट्र कोई देवी नहीं

देश में ‘वंदे मातरम’ को लेकर एक बार फिर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। केंद्र सरकार द्वारा इसे राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के समान महत्व दिए जाने की चर्चा के बीच एआईएमआईएम प्रमुख और हैदराबाद सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। ओवैसी ने कहा कि भारत अपने नागरिकों से बनता है, किसी देवी या धार्मिक प्रतीक से नहीं। उन्होंने इस मुद्दे को संविधान, धर्मनिरपेक्षता और राष्ट्रीय पहचान से जोड़ते हुए कई सवाल खड़े किए। उनके बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में नई बहस शुरू हो गई है।

‘जन गण मन’ और ‘वंदे मातरम’ की तुलना पर आपत्ति

असदुद्दीन ओवैसी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट कर कहा कि ‘वंदे मातरम’ और ‘जन गण मन’ की प्रकृति अलग-अलग है। उनके मुताबिक ‘जन गण मन’ देश और उसके नागरिकों की एकता का प्रतीक है, जबकि ‘वंदे मातरम’ में देवी स्वरूप की आराधना का भाव दिखाई देता है। ओवैसी का कहना है कि किसी धार्मिक या सांस्कृतिक प्रतीक को पूरे राष्ट्र की पहचान के रूप में स्थापित करना संविधान की मूल भावना के खिलाफ हो सकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि राष्ट्र की अवधारणा नागरिकों पर आधारित होनी चाहिए, न कि किसी विशेष धार्मिक प्रतीक पर।

संविधान का हवाला देकर कही बड़ी बात

ओवैसी ने अपने बयान में भारतीय संविधान की प्रस्तावना और अनुच्छेद-1 का उल्लेख करते हुए कहा कि संविधान “हम भारत के लोग” से शुरू होता है। उन्होंने कहा कि संविधान भारत को राज्यों का संघ बताता है और हर नागरिक को विचार, अभिव्यक्ति, आस्था और उपासना की स्वतंत्रता देता है। उनके अनुसार, संविधान निर्माताओं ने देश को किसी एक धार्मिक पहचान से जोड़ने के बजाय लोकतांत्रिक और समावेशी स्वरूप दिया था। उन्होंने कहा कि भारत सभी नागरिकों का समान देश है और इसकी पहचान किसी देवी-देवता के नाम से नहीं की जा सकती।

ऐतिहासिक संदर्भों का भी किया जिक्र

ओवैसी ने दावा किया कि इतिहास में कई प्रमुख नेताओं ने ‘वंदे मातरम’ को लेकर आपत्तियां जताई थीं। उन्होंने महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, नेताजी सुभाष चंद्र बोस और रवींद्रनाथ टैगोर जैसे नेताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि राष्ट्र की पहचान को धार्मिक प्रतीकों से अलग रखने पर उस दौर में भी चर्चा हुई थी। उन्होंने यह भी कहा कि संविधान सभा में प्रस्तावना की शुरुआत धार्मिक संदर्भों से करने के सुझाव आए थे, लेकिन उन्हें स्वीकार नहीं किया गया। उनके मुताबिक यह फैसला भारत की धर्मनिरपेक्ष सोच को मजबूत करने वाला था।

बयान के बाद तेज हुई राजनीतिक बहस

ओवैसी के बयान के बाद राजनीतिक माहौल गरमा गया है। एक ओर उनके समर्थक इसे संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा से जोड़ रहे हैं, वहीं विरोधी दल इसे राष्ट्रभावना के खिलाफ बता रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ‘वंदे मातरम’ जैसे संवेदनशील मुद्दे अक्सर चुनावी और वैचारिक बहस का केंद्र बन जाते हैं। आने वाले दिनों में यह विवाद और अधिक राजनीतिक रंग ले सकता है।

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