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नोएडा वायरल वीडियो विवाद: अभिव्यक्ति की आज़ादी बनाम जिम्मेदारी पर फिर छिड़ी बहस

देश में छात्र आंदोलन, राजनीति और सोशल मीडिया के बीच अब बहस मुद्दों से ज्यादा भाषा और व्यवहार पर केंद्रित होती नजर आ रही है। ताज़ा मामला नोएडा से सामने आया है, जहां एक वायरल वीडियो ने अभिव्यक्ति की आज़ादी और उसकी सीमाओं को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है।

दरअसल, दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए छात्र आंदोलन के दौरान एक वीडियो सामने आया, जिसमें एक युवती—रुचिका सिंह—प्रधानमंत्री के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करती दिखाई दी। वीडियो वायरल होते ही पुलिस ने मामला दर्ज किया और कार्रवाई शुरू की। इसके बाद रुचिका सिंह ने एक वीडियो जारी कर अपने बयान पर माफी भी मांगी।

इस मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी एक बयान सामने आया, जिसमें उन्होंने कहा कि बच्चों से गलतियां हो जाती हैं और उन्हें माफ किया जाना चाहिए, ऐसे मामलों को अदालत तक नहीं ले जाना चाहिए।

वहीं, CJP के प्रवक्ता सौरभ दास ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा कि गाली देना कब से अपराध हो गया। उनका कहना है कि यदि किसी को आपत्ति है तो वह मानहानि का दावा कर सकता है।

इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या अभिव्यक्ति की आज़ादी का मतलब किसी भी प्रकार की भाषा का इस्तेमाल करना है? लोकतंत्र में अपनी बात रखना हर नागरिक का अधिकार है, लेकिन इसके साथ जिम्मेदारी भी उतनी ही जरूरी है।

पेपर लीक जैसे गंभीर मुद्दों पर गुस्सा और विरोध स्वाभाविक है, लेकिन विरोध की भाषा और तरीका भी मर्यादित होना चाहिए। खासकर युवाओं से यह उम्मीद की जाती है कि वे अपनी बात संयम और जिम्मेदारी के साथ रखें, ताकि समाज में सकारात्मक संदेश जाए।

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