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नेपाल बाढ़ के 7 दिन बाद भी तबाही जारी, 1,127 मौतें और 4,858 लोग लापता; भारत ने बढ़ाया मदद का हाथ

नेपाल में 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ के सात दिन बाद भी हालात बेहद गंभीर बने हुए हैं। भोटेकोशी-त्रिशूली नदी घाटी में आई इस भीषण आपदा ने बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान किया है। 2 सितंबर तक मौतों का आंकड़ा 1,127 से ज्यादा पहुंच चुका है, जबकि 4,858 लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। तिब्बत में हुई मौतों को जोड़ने पर मृतकों की संख्या 1,143 हो जाती है। राहत और बचाव अभियान लगातार जारी है, लेकिन बारिश, भूस्खलन और भारी मलबा टीमों के सामने बड़ी चुनौती बने हुए हैं। आइए 10 सवालों में समझते हैं कि सात दिन बाद नेपाल में हालात क्या हैं।

1. नेपाल बाढ़ में अब तक कितनी मौतें और कितने लोग लापता हैं?

2 सितंबर तक नेपाल में बाढ़ और उससे जुड़ी घटनाओं में 1,127 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। तिब्बत की ओर हुई 16 मौतों को जोड़ने पर कुल आंकड़ा 1,143 तक पहुंचता है। वहीं, करीब 4,858 लोग अभी भी लापता हैं। लापता लोगों में 583 विदेशी नागरिक और 83 नेपाली सुरक्षाकर्मी भी शामिल बताए जा रहे हैं। राहत एवं बचाव एजेंसियों ने अब तक 12 हजार से ज्यादा लोगों को सुरक्षित निकाला है। करीब 84,270 लोग 17 नगरपालिकाओं में इस आपदा से प्रभावित हुए हैं। जैसे-जैसे राहत टीमें दूरदराज के इलाकों तक पहुंच रही हैं, नुकसान का वास्तविक आंकड़ा और बढ़ने की आशंका है।

2. सबसे ज्यादा तबाही किन इलाकों में हुई?

बाढ़ से नेपाल के कई जिलों में भारी तबाही हुई है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक चितवन में 321, नवलपरासी पूर्व में 216 और नवलपरासी पश्चिम में 170 लोगों की मौत हुई है। नुवाकोट के बेतरावती में उत्तरगया मिनी मार्ट के एक शॉपिंग आर्केड से 24 शव बरामद किए गए। इनमें 13 महिलाएं, 10 पुरुष और एक बच्चा शामिल था। वहीं भोटेकोशी मार्ग पर स्थित रसुवागढ़ी इमिग्रेशन ऑफिस भी पूरी तरह बह गया। घटना के वक्त यहां करीब 300 से 400 लोग मौजूद बताए गए थे। इमिग्रेशन ऑफिस के चार कर्मचारी भी लापता हैं, जिनमें कार्यालय प्रमुख भी शामिल हैं।

3. बचाव अभियान में सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

नेपाली सेना और अन्य बचाव एजेंसियां लगातार सातवें दिन भी सर्च और रेस्क्यू ऑपरेशन में जुटी हैं। सबसे कठिन चुनौती त्रिशूली नदी के किनारे मौजूद हाइड्रोपावर परियोजनाओं की सुरंगों में फंसे लोगों तक पहुंचना है। अनुमान है कि करीब 639 कर्मचारी अलग-अलग सुरंगों में फंसे हो सकते हैं। पानी और मलबे के कारण कई सुरंगों के प्रवेश द्वार बंद हो गए हैं। स्थिति को देखते हुए नेपाल ने भारत, चीन और दक्षिण कोरिया से विशेषज्ञ मदद मांगी है। लगातार बारिश और नए भूस्खलन राहत कार्य को मुश्किल बना रहे हैं। कई दूरदराज के गांवों से अब भी संपर्क पूरी तरह बहाल नहीं हो पाया है।

4. नेपाल में अज्ञात शवों को सामूहिक रूप से क्यों दफनाया गया?

आपदा का पैमाना इतना बड़ा है कि अस्पतालों और शवगृहों की क्षमता पर दबाव बढ़ गया। कई शव लंबे समय तक पानी और कीचड़ में रहने के कारण खराब हो गए और उनकी पहचान करना मुश्किल हो गया। इसी वजह से अज्ञात शवों को अस्थायी तौर पर दफनाने का फैसला लिया गया। काठमांडू के गोकर्णा क्षेत्र में बड़े गड्ढे तैयार कर करीब 75 शवों को दफनाया गया। अधिकारियों ने शवों को नंबर दिए और उनके फोटो, DNA सैंपल तथा उपलब्ध पहचान संबंधी जानकारी सुरक्षित रखी। इसका उद्देश्य भविष्य में परिजनों को वैज्ञानिक तरीके से शवों की पहचान में मदद करना है। इससे पहले भी अलग-अलग स्थानों पर 200 से ज्यादा शव दफनाए जा चुके थे।

5. विदेशी नागरिकों की स्थिति क्या है?

लापता लोगों की सूची में बड़ी संख्या विदेशी नागरिकों की भी है। आंकड़ों के मुताबिक 583 विदेशी नागरिक लापता बताए जा रहे हैं, जिनमें सबसे ज्यादा 275 भारतीय हैं। इसके अलावा चीन, अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और इटली समेत कई देशों के नागरिक शामिल हैं। इनमें पर्यटकों के अलावा व्यापारी और हाइड्रोपावर परियोजनाओं में काम करने वाले इंजीनियर तथा कर्मचारी भी थे। रसुवागढ़ी इमिग्रेशन ऑफिस में घटना से कुछ समय पहले तक लोगों की एंट्री दर्ज हो रही थी। इसके करीब 10 मिनट बाद अचानक आए मलबे और पानी के तेज बहाव ने पूरे इलाके को अपनी चपेट में ले लिया।

6. क्या नेपाल में फिर बाढ़ का खतरा है?

राहत अभियान के बीच नेपाल के सामने एक और खतरा मंडरा रहा है। मौसम विभाग ने कई क्षेत्रों में नदियों का जलस्तर बढ़ने को लेकर अलर्ट जारी किया है। पूर्वी, मध्य और पश्चिमी नेपाल में बारिश के कारण नदियों और जलधाराओं में फिर उफान आने की आशंका है। नुवाकोट और रसुवा जैसे जिलों में फ्लैश फ्लड का खतरा खास तौर पर बताया गया है। प्रशासन ने लोगों को नदियों और नालों के किनारे जाने से बचने की सलाह दी है। चीन की ओर बने एक अस्थायी बांध के टूटने की खबर ने भी चिंता बढ़ाई थी। ऐसे में बचाव दलों को एक साथ राहत और संभावित नए खतरे से निपटना पड़ रहा है।

7. प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह पर क्या दबाव है?

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह की सरकार पर अंतरराष्ट्रीय मंच पर आपदा का मुद्दा उठाने का दबाव बढ़ रहा है। सरकार चाहती है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा के मंच से नेपाल जलवायु न्याय की मांग को मजबूती से सामने रखे। नेपाल का तर्क है कि वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में उसका योगदान बेहद कम है, लेकिन जलवायु परिवर्तन से जुड़ी प्राकृतिक आपदाओं का असर उसे गंभीर रूप से झेलना पड़ रहा है। इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय समुदाय से राहत, पुनर्वास और पुनर्निर्माण के लिए सहायता मांगे जाने की तैयारी है। पहले विदेश मंत्री को UNGA भेजने की योजना थी, लेकिन प्रधानमंत्री के स्तर पर प्रतिनिधित्व को लेकर चर्चा तेज हो गई है।

8. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नेपाल को क्या मदद मिल रही है?

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की रिपोर्ट के अनुसार बाढ़ के बाद करीब 22 लाख टन मलबा जमा हुआ है। इसमें इमारतों का मलबा, घरेलू सामान, वनस्पति, चट्टानें और तलछट शामिल हैं। रेड क्रॉस ने आपात राहत के लिए 25 मिलियन स्विस फ्रैंक की अपील की है। जर्सी की ओर से भी आर्थिक सहायता की घोषणा की गई है। भारत, चीन और दक्षिण कोरिया की विशेषज्ञ टीमें राहत और टनल रेस्क्यू से जुड़े अभियानों में सहयोग कर रही हैं। संयुक्त राष्ट्र ने यह भी चिंता जताई है कि खेती पर निर्भर परिवारों के लिए संकट और बढ़ सकता है, क्योंकि बाढ़ ने मानसून के दौरान होने वाली खेती और फसलों को भारी नुकसान पहुंचाया है।

9. भारत ने नेपाल की कितनी मदद की?

नेपाल की त्रासदी के बाद भारत ने राहत और बचाव अभियान में व्यापक सहयोग दिया है। अब तक भारतीय राहत विमानों के जरिए 68.5 टन से ज्यादा राहत सामग्री पहुंचाई गई है। इसमें टेंट, कंबल, दवाइयां, सोलर लैंप और हाइजीन किट शामिल हैं। भारत की विशेष टनल रेस्क्यू टीम और 19 सदस्यीय फोरेंसिक-DNA विशेषज्ञ टीम भी नेपाल में काम कर रही है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक अब तक 163 भारतीय नागरिकों को सुरक्षित निकाला जा चुका है। भारत ने मलबे के बीच रास्ते बनाने, बेली ब्रिज और ब्लास्टिंग ऑपरेशन में विशेषज्ञ सहयोग भी दिया है। भारतीय दूतावास ने आपात स्थिति में संपर्क के लिए हेल्पलाइन और ईमेल की सुविधा भी उपलब्ध कराई है।

10. आने वाले दिनों में नेपाल के सामने सबसे बड़ी चुनौतियां क्या हैं?

सात दिन बीतने के बाद भी नेपाल के सामने राहत और पुनर्वास की बड़ी चुनौती है। सबसे पहले सुरंगों में फंसे सैकड़ों कर्मचारियों तक पहुंचकर उन्हें सुरक्षित निकालना जरूरी है। इसके अलावा लाखों टन मलबे को हटाना होगा, ताकि सड़क और राहत के रास्ते दोबारा खोले जा सकें। दूषित पानी और लंबे समय तक पड़े शवों के कारण संक्रामक बीमारियों का खतरा भी बढ़ सकता है। लगातार बारिश और नए भूस्खलन राहत टीमों के लिए जोखिम पैदा कर रहे हैं। सबसे बड़ी मानवीय चुनौती हजारों लापता लोगों के परिवारों को सही जानकारी देना है। हर गुजरते दिन के साथ परिजनों की चिंता बढ़ती जा रही है और नेपाल को अब राहत के साथ बड़े पैमाने पर पुनर्निर्माण की तैयारी भी करनी होगी।

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Stv News Rajasthan

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