हरियाणा को बड़ा झटका: NCR दायरा 60% घटाने की तैयारी
हरियाणा में एनसीआर (NCR) के दायरे को लेकर बड़ा बदलाव होने की तैयारी है। एनसीआर प्लानिंग बोर्ड की 16 जून की अहम बैठक में सीमा पुनर्निर्धारण पर निर्णय लिया जा सकता है। प्रस्ताव के अनुसार एनसीआर का क्षेत्र करीब 60 प्रतिशत तक घट सकता है, जिससे पानीपत, करनाल समेत कई प्रमुख जिले इस क्षेत्र से बाहर हो सकते हैं। इस फैसले का सीधा असर विकास, निवेश और रियल एस्टेट बाजार पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
एनसीआर सीमा पुनर्निर्धारण का बड़ा प्रस्ताव
एनसीआरपीबी (NCR Planning Board) की बैठक में ‘ड्राफ्ट रीजनल प्लान-2041’ के तहत नए सीमा सिद्धांतों को मंजूरी दी जा सकती है। प्रस्ताव में कहा गया है कि अब केवल दिल्ली के राजघाट से 100 किलोमीटर के दायरे में आने वाले क्षेत्रों को ही एनसीआर में शामिल किया जाएगा। वर्तमान में हरियाणा के 14 जिले एनसीआर का हिस्सा हैं, लेकिन नए फॉर्मूले के लागू होने के बाद यह क्षेत्र घटकर लगभग 10,546 वर्ग किलोमीटर तक सीमित रह जाएगा, जो करीब 60% की बड़ी कटौती होगी।
कई जिलों पर बाहर होने का खतरा
नए प्रस्ताव के तहत हरियाणा के पानीपत, करनाल, जींद, भिवानी और महेंद्रगढ़ जैसे जिलों के बड़े हिस्से एनसीआर से बाहर हो सकते हैं। खासकर करनाल और महेंद्रगढ़, जो दिल्ली से 110 किलोमीटर से अधिक दूरी पर हैं, उनका बाहर होना लगभग तय माना जा रहा है। वहीं पानीपत और जींद बॉर्डर लाइन पर होने के कारण आंशिक रूप से प्रभावित होंगे। सरकार ने केवल उन्हीं तहसीलों को शामिल रखने का नियम प्रस्तावित किया है जो पूरी तरह 100 किलोमीटर के भीतर आती हैं।
हाईवे कॉरिडोर से राहत की कोशिश
हरियाणा सरकार ने नुकसान को कम करने के लिए बफर प्लान तैयार किया है। प्रस्ताव के अनुसार एनएच-44, एनएच-48 और एनएच-9 समेत 11 राष्ट्रीय राजमार्गों के दोनों ओर 1-1 किलोमीटर क्षेत्र को एनसीआर में बनाए रखने की बात कही गई है। इससे करनाल और पानीपत जैसे शहरों के कुछ हिस्से एनसीआर में बने रह सकते हैं। हालांकि जींद और महेंद्रगढ़ जैसे जिले इस सुरक्षा कवच से बाहर रह सकते हैं, जिससे वे पूरी तरह एनसीआर लाभों से वंचित हो जाएंगे।
विकास और प्रॉपर्टी बाजार पर असर
एनसीआर से बाहर होने का सबसे बड़ा असर इन जिलों के विकास और रियल एस्टेट बाजार पर पड़ेगा। एनसीआरपीबी से मिलने वाली इंफ्रास्ट्रक्चर फंडिंग, जो अब तक 32,000 करोड़ रुपये से अधिक रही है, इन क्षेत्रों को नहीं मिल पाएगी। इसके साथ ही RRTS और ऑर्बिटल रेल जैसी बड़ी परियोजनाएं भी प्रभावित हो सकती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे जमीन की कीमतों में गिरावट और बड़े निवेशकों की वापसी जैसी स्थिति बन सकती है।