खामेनेई के अंतिम संस्कार में अलग-अलग देशों के लिए पढ़ी गईं अलग आयतें, संदेशों पर छिड़ी चर्चा
ईरान में सुप्रीम लीडर अली खामेनेई के अंतिम संस्कार के दौरान विदेशी प्रतिनिधिमंडलों के स्वागत में पढ़ी गई अलग-अलग कुरान की आयतों को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। कुछ विश्लेषकों और ईरानी मीडिया रिपोर्टों का दावा है कि इन आयतों का चयन संबंधित देशों को प्रतीकात्मक राजनीतिक और कूटनीतिक संदेश देने के उद्देश्य से किया गया था। हालांकि, ईरानी सरकार ने इस बारे में कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी नहीं किया है।
अलग-अलग प्रतिनिधिमंडलों के लिए अलग आयतें पढ़े जाने का दावा
तेहरान के ग्रैंड मोसल्ला धार्मिक परिसर में आयोजित श्रद्धांजलि कार्यक्रम में 30 से अधिक देशों के प्रतिनिधिमंडल शामिल हुए। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों के पहुंचने पर अलग-अलग कुरान की आयतों का पाठ किया गया। इसके बाद यह चर्चा तेज हो गई कि इन आयतों का चयन केवल धार्मिक परंपरा का हिस्सा था या फिर इनके जरिए कूटनीतिक संकेत देने की कोशिश की गई। हालांकि, इस संबंध में ईरान की ओर से कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।
सऊदी अरब के लिए पढ़ी गई आयत पर सबसे ज्यादा चर्चा
रिपोर्टों के मुताबिक, सऊदी अरब के उप विदेश मंत्री वलीद बिन अब्दुल करीम के पहुंचने पर कुरान की सूरह आल-इमरान (3:13) की आयत पढ़ी गई, जिसमें बद्र की लड़ाई का उल्लेख है। कुछ पश्चिम एशिया मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि इस आयत का चयन प्रतीकात्मक संदेश के तौर पर देखा जा सकता है। वहीं अन्य विश्लेषकों का कहना है कि इसकी व्याख्या अलग-अलग दृष्टिकोण से की जा सकती है और इसे लेकर कोई आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
भारतीय प्रतिनिधिमंडल के लिए अपेक्षाकृत नरम संदेश
कार्यक्रम में भारत के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व पूर्व सैन्य अधिकारी और राजनयिक सैयद अता हसनैन ने किया। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, भारतीय प्रतिनिधिमंडल के स्वागत के दौरान जो आयत पढ़ी गई, उसका भाव धैर्य, साहस और निराश न होने का संदेश देने वाला था। विश्लेषकों का कहना है कि अन्य कुछ प्रतिनिधिमंडलों की तुलना में भारत के लिए पढ़ी गई आयत का स्वर अपेक्षाकृत शांत और सकारात्मक था। हालांकि, आयोजकों ने इसके चयन का कोई आधिकारिक कारण नहीं बताया।
रूस, चीन और मिस्र के लिए भी शांत संदेश बताए गए
रिपोर्टों के अनुसार, रूस, चीन और मिस्र के प्रतिनिधिमंडलों के स्वागत में भी ऐसी आयतें पढ़ी गईं जिनमें संघर्ष के बजाय धैर्य, सदाचार और पुरस्कार जैसे विषयों का उल्लेख था। इससे यह अनुमान लगाया जा रहा है कि ईरान ने अलग-अलग देशों के साथ अपने संबंधों के अनुरूप प्रतीकात्मक संदेश देने की कोशिश की। हालांकि, यह विश्लेषकों की व्याख्या है और इसे लेकर ईरानी सरकार की कोई आधिकारिक टिप्पणी सामने नहीं आई है।
ईरानी मीडिया ने भी उठाए सवाल
ईरान के कुछ मीडिया संस्थानों ने भी इस घटनाक्रम पर चर्चा की है। रिपोर्टों के अनुसार, कुछ प्रकाशनों ने इसे सार्वजनिक कूटनीति (Public Diplomacy) का नया तरीका बताया है, जबकि अन्य ने इसे धार्मिक पाठ के माध्यम से नैतिक और राजनीतिक संदेश देने की रणनीति करार दिया। हालांकि, आधिकारिक स्तर पर यह स्पष्ट नहीं किया गया कि प्रत्येक प्रतिनिधिमंडल के लिए अलग-अलग आयतें चुनने का आधार क्या था।