सिंधु जल संधि पर बढ़ी बेचैनी, पाकिस्तानी पूर्व सैन्य अधिकारी ने बताई बहाली की 3 संभावित राहें
भारत द्वारा सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को निलंबित किए जाने के बाद पाकिस्तान में इसके संभावित असर को लेकर चिंता लगातार बढ़ रही है। अब पाकिस्तान के एक सेवानिवृत्त वरिष्ठ सैन्य अधिकारी ने अपने लेख में चेतावनी दी है कि यदि मौजूदा स्थिति लंबी चली तो इसका असर देश की कृषि, जल प्रबंधन और ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ सकता है। साथ ही उन्होंने संधि को दोबारा लागू करने के लिए तीन संभावित विकल्प भी सुझाए हैं।
सिंधु जल संधि को बताया पाकिस्तान की जल व्यवस्था की रीढ़
पाकिस्तान के रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल मोहम्मद सईद ने अपने लेख में कहा कि सिंधु जल संधि केवल एक अंतरराष्ट्रीय समझौता नहीं, बल्कि पाकिस्तान की सिंचाई और जल प्रबंधन प्रणाली की आधारशिला रही है। उनके अनुसार, इसी समझौते के तहत सिंधु बेसिन सिंचाई प्रणाली विकसित हुई, जिसके माध्यम से करोड़ों एकड़ कृषि भूमि की सिंचाई होती है। उनका कहना है कि देश की खाद्य सुरक्षा, कृषि उत्पादन और जलविद्युत परियोजनाओं का बड़ा हिस्सा इसी जल व्यवस्था पर निर्भर करता है।
भारत के फैसले से जल प्रबंधन पर बढ़ी चिंता
पूर्व सैन्य अधिकारी के अनुसार, भारत द्वारा संधि को निलंबित करने और जल संबंधी सूचनाओं के आदान-प्रदान पर रोक लगाने से पाकिस्तान के लिए नदी प्रवाह का पूर्वानुमान लगाना कठिन हो सकता है। उनका दावा है कि यदि भविष्य में जल प्रवाह की मात्रा और समय में बदलाव होता है तो इससे सिंचाई, बाढ़ प्रबंधन और जल संसाधनों की योजना पर असर पड़ सकता है। हालांकि भारत की ओर से इस विषय पर अलग रुख अपनाया गया है और दोनों देशों के बीच यह मुद्दा कूटनीतिक स्तर पर भी चर्चा का विषय बना हुआ है।
चिनाब नदी को लेकर जताई दीर्घकालिक चिंता
लेख में चिनाब नदी को पाकिस्तान की कृषि के लिए सबसे महत्वपूर्ण नदियों में से एक बताया गया है। पूर्व अधिकारी का कहना है कि इस नदी का जल प्रवाह यदि प्रभावित होता है तो पंजाब सहित कई कृषि क्षेत्रों पर व्यापक असर पड़ सकता है। उन्होंने आशंका जताई कि भविष्य में भारत की नई जल परियोजनाएं पूरी होने के बाद जल प्रवाह के प्रबंधन की उसकी क्षमता और बढ़ सकती है। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और भारत ने इन परियोजनाओं को अपनी संप्रभु सीमाओं के भीतर विकास कार्य बताया है।
संधि बहाल करने के लिए सुझाए तीन विकल्प
मोहम्मद सईद ने अपने लेख में मौजूदा गतिरोध खत्म करने के लिए तीन प्रमुख रास्तों का सुझाव दिया। पहला, भारत और पाकिस्तान के बीच सीधे कूटनीतिक संवाद को फिर से शुरू किया जाए। दूसरा, सिंधु जल संधि के तहत मौजूद संस्थागत तंत्र और विवाद समाधान प्रक्रिया को सक्रिय किया जाए ताकि तकनीकी और कानूनी स्तर पर समाधान निकाला जा सके। तीसरा, यदि द्विपक्षीय वार्ता से रास्ता नहीं निकलता है तो अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता या वैश्विक मंचों के माध्यम से समाधान तलाशने की कोशिश की जाए। उनका मानना है कि जल विवाद को टकराव के बजाय संवाद से सुलझाना दोनों देशों के हित में होगा।
जल विवाद के रणनीतिक और आर्थिक मायने
विशेषज्ञों का मानना है कि सिंधु जल संधि दक्षिण एशिया के सबसे महत्वपूर्ण जल समझौतों में से एक रही है। इस संधि से जुड़े किसी भी बदलाव का असर केवल जल संसाधनों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि कृषि, ऊर्जा उत्पादन, खाद्य सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता पर भी पड़ सकता है। इसलिए भविष्य में दोनों देशों के बीच होने वाली बातचीत और कूटनीतिक पहल इस पूरे मुद्दे की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएगी।