‘मां’ दूसरे व्यक्ति के साथ रहने पर अड़ी, हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने रखी शर्त
इंदौर। मध्यप्रदेश में हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने एक संवेदनशीतम नाबालिग बालिका की अभिरक्षा (कस्टडी) से जुड़े मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जस्टिस प्रणय वर्मा और जस्टिस जय कुमार पिल्लई की खंडपीठ ने बालिका की अस्थायी कस्टडी उसकी मां को सौंप दी है, लेकिन इसके साथ एक कड़ी शर्त भी रखी है कि सक्षम न्यायालय की पूर्व अनुमति के बिना बालिका को राजस्थान की सीमा से बाहर नहीं ले जाया जा सकेगा। यह आदेश उस समय आया जब पिता ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर कर अपनी पत्नी और 11 वर्षीय बेटी की बरामदगी की मांग की थी। कोर्ट ने बंद कमरे में बालिका की इच्छा जानने के बाद यह निर्णय लिया।
पति के साथ नहीं रहना चाहती महिला, राजस्थान जाने पर अड़ी
सुनवाई के दौरान महिला ने कोर्ट के समक्ष स्पष्ट रूप से अपनी बात रखी कि वह अपने पति के साथ नहीं रहना चाहती। उसने न्यायालय को बताया कि वह राजस्थान के कुंभलगढ़ में रहना पसंद करेगी। महिला वहां एक अन्य व्यक्ति के साथ रह रही है। जब 25 मई को महिला और बालिका कोर्ट में पेश हुई थीं, तब महिला ने यह इच्छा व्यक्त की थी। न्यायालय ने महिला की कथित अवैध हिरासत से जुड़े मुद्दे को तो समाप्त कर दिया था, लेकिन नाबालिग बालिका की अभिरक्षा का प्रश्न विचाराधीन रखा था। महिला का कहना है कि इंदौर में उसके पति के पास बालिका की देखभाल के लिए पर्याप्त व्यवस्था नहीं है।
बंद कमरे में बालिका से पूछी गई इच्छा, मां के साथ रहने का किया इजहार
इस संवेदनशील मामले में न्यायालय ने बंद कमरे में आवश्यक पक्षों के बीच चर्चा करते हुए बालिका की इच्छा भी जानी। इस दौरान बालिका ने स्पष्ट रूप से अपनी मां के साथ रहने की इच्छा व्यक्त की। बालिका का कहना था कि वह अपनी मां के साथ ही रहना चाहती है। मां ने भी कोर्ट को आश्वस्त किया कि वह बालिका की बेहतर देखभाल कर सकती है। मां के साथ रहने वाले व्यक्ति ने भी लिखित आश्वासन दिया कि वह बालिका की देखभाल करेगा। इतना ही नहीं, उस व्यक्ति की बहन ने भी कुंभलगढ़ में रहकर बालिका के पालन-पोषण में सहयोग करने की सहमति दी।
पिता के पास नहीं है बालिका की देखभाल की व्यवस्था
कोर्ट ने यह भी देखा कि इंदौर में पिता अपने 17 वर्षीय पुत्र के साथ रहते हैं और वहां बालिका की देखभाल के लिए परिवार का कोई अन्य सदस्य उपलब्ध नहीं है। दूसरी ओर, मां के साथ रहने वाले व्यक्ति और उसकी बहन ने बालिका की देखभाल के लिए लिखित आश्वासन दिया है। कोर्ट ने इन सभी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए अस्थायी कस्टडी मां को सौंपना उचित माना। हालांकि, कोर्ट ने पिता को यह स्वतंत्रता भी बरकरार रखी है कि यदि वह चाहे तो नाबालिग बालिका की वैधानिक अभिरक्षा प्राप्त करने के लिए सक्षम न्यायालय के समक्ष उचित कानूनी कार्यवाही कर सकता है।
बच्चे का कल्याण सर्वोपरि: कोर्ट का ऐतिहासिक सिद्धांत
खंडपीठ ने अपने आदेश में हिंदू अल्पसंख्यकता एवं संरक्षकता अधिनियम का हवाला देते हुए कहा कि पांच वर्ष से अधिक आयु के बच्चों का पिता प्राकृतिक संरक्षक माना जाता है। लेकिन अभिरक्षा विवादों में बच्चे का कल्याण सर्वोपरि होता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानूनी प्रावधानों के बावजूद, परिस्थितियों को देखते हुए अस्थायी कस्टडी मां को सौंपना उचित है। यह फैसला इस बात का प्रमाण है कि भारतीय न्यायपालिका बच्चों के अधिकारों और उनके कल्याण को कितनी गंभीरता से लेती है। बालिका की इच्छा और उसके भविष्य को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय लिया गया।
मूसाखेड़ी निवासी पिता ने दायर की थी बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका
यह पूरा मामला मूसाखेड़ी क्षेत्र निवासी एक व्यक्ति द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया था कि उसकी पत्नी और 11 वर्षीय बेटी 4 मई से लापता हैं। उसने दोनों के राजस्थान में होने की आशंका जताते हुए पुलिस आयुक्त को शिकायत की थी। जब पुलिस कार्रवाई से संतोष नहीं हुआ, तो उसने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। सुनवाई के दौरान पुलिस की कार्रवाई के बाद 25 मई को महिला और बालिका कोर्ट में पेश हुई थीं। इसके बाद न्यायालय ने मामले की गंभीरता को देखते हुए बंद कमरे में सुनवाई की और अंततः यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया।