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भारतीय नौसेना का स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत श्रीलंका पहुंचे…

भारत का पहला स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत और अत्याधुनिक फ्रिगेट आईएनएस उदयगिरि पहली बार अंतरराष्ट्रीय ऑपरेशन पर श्रीलंका पहुंचे हैं। ये दोनों युद्धपोत श्रीलंका नौसेना की 75वीं वर्षगांठ पर आयोजित इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू में हिस्सा ले रहे हैं और भारतीय नौसेना की ताकत और क्षेत्रीय सहयोग को दर्शाते हैं।

आईएनएस विक्रांत और आईएनएस उदयगिरि की महत्वाकांक्षी तैनाती

यह पहली अंतरराष्ट्रीय ऑपरेशनल तैनाती भारतीय नौसेना की प्रतिबद्धता को दर्शाती है कि वह अपने पड़ोसी देशों और हिन्द महासागर क्षेत्र में साझीदार नौसेनाओं के साथ मजबूत सहयोग बनाए रखना चाहती है। इस कदम से क्षेत्र में शांति, स्थिरता और समुद्री सुरक्षा को बढ़ावा देने की भारत की नीति भी स्पष्ट होती है।

फ्लीट रिव्यू में भारत का प्रतिनिधित्व

कोलंबो में दोनों युद्धपोत औपचारिक फ्लीट रिव्यू, सिटी परेड, सामुदायिक कार्यक्रम और पेशेवर नौसैनिक आदान-प्रदान में हिस्सा लेंगे। इस दौरान स्थानीय नागरिक भी भारतीय नौसेना की ताकत और जहाजों की अद्भुत तकनीक को नजदीक से देख पाएंगे।

आईएनएस विक्रांत की ताकत और विशेषताएं

आईएनएस विक्रांत भारत का सबसे आधुनिक और स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर है। यह लगभग 45,000 टन वजनी है, इसकी रफ्तार 52 किलोमीटर प्रति घंटा और रेंज 75,000 नॉटिकल माइल्स है। इसमें लगभग 30 लड़ाकू विमान तैनात किए जा सकते हैं। यह ब्रह्मोस से लेकर बराक मिसाइलों तक से लैस है, जिससे समुद्र या जमीन से किसी भी हमले का जवाब देने में सक्षम है।

आईएनएस उदयगिरि: नीलगिरी क्लास की स्टील्थ फ्रिगेट

आईएनएस उदयगिरि 6,600 टन वजन की स्टील्थ तकनीक से लैस फ्रिगेट है। यह दुश्मनों को चकमा देने में सक्षम है और इसमें ब्रह्मोस और बराक जैसी मिसाइलें लगी हैं। इसके अलावा, पनडुब्बी को मार गिराने के लिए वरणास्त्र और सबमरीन रॉकेट लांचर भी इसमें मौजूद हैं।

स्वदेशी नौसैनिक ताकत का संदेश

इन दोनों जहाजों की श्रीलंका यात्रा भारतीय नौसेना की स्वदेशी जहाज-निर्माण क्षमता और हिन्द महासागर में लगातार बढ़ती समुद्री मौजूदगी का प्रमाण है। यह भारत की समुद्री रणनीति में मजबूती और क्षेत्रीय सहयोग को सशक्त करने का प्रतीक है।

हिन्द महासागर में रणनीतिक प्रभाव

आईएनएस विक्रांत और आईएनएस उदयगिरि की तैनाती से भारत के समुद्री रणनीतिक हित मजबूत होंगे। यह कदम न केवल पड़ोसी देशों के साथ साझेदारी को बढ़ाता है बल्कि हिन्द महासागर में भारत की संतुलित और प्रभावी मौजूदगी को भी दर्शाता है।

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