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अमेरिका पर निर्भरता से दूरी! फाइटर जेट इंजन के लिए यूरोप की ओर क्यों बढ़ रहा भारत, जानिए Safran और Rolls-Royce की रेस

भारतीय वायुसेना को आधुनिक बनाने की दिशा में तेजस, TEDBF और AMCA जैसे लड़ाकू विमान अहम भूमिका निभा रहे हैं। लेकिन अमेरिकी कंपनी GE से इंजन आपूर्ति में लगातार देरी और बढ़ती लागत ने भारत की रणनीतिक चिंता बढ़ा दी है। यही वजह है कि अब भारत पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट इंजन के लिए यूरोपीय कंपनियों Safran और Rolls-Royce के साथ साझेदारी की संभावनाओं पर तेजी से काम कर रहा है।

अमेरिकी इंजन पर बढ़ती निर्भरता बनी चुनौती

पिछले डेढ़ दशक में भारत ने रक्षा क्षेत्र में अमेरिका के साथ सहयोग बढ़ाया, लेकिन लड़ाकू विमानों के इंजन के मामले में एक ही विदेशी सप्लायर पर बढ़ती निर्भरता अब चिंता का विषय बन गई है। वर्तमान में तेजस Mk-1A, तेजस Mk-2, नौसेना के ट्विन इंजन डेक बेस्ड फाइटर (TEDBF) और शुरुआती AMCA विमानों के लिए अमेरिकी GE इंजन प्रस्तावित हैं। इससे कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं एक ही कंपनी पर निर्भर हो गई हैं।

GE की देरी से प्रभावित हुई तेजस परियोजना

हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) ने GE द्वारा तय समय पर इंजन नहीं देने पर जुर्माना भी लगाया है। 99 F404 इंजनों की आपूर्ति में देरी के कारण तेजस Mk-1A की डिलीवरी करीब दो साल पीछे चली गई है। इस देरी का सीधा असर भारतीय वायुसेना की स्क्वाड्रन क्षमता पर पड़ रहा है, जिसे पहले से ही नए लड़ाकू विमानों की जरूरत है।

इंजन की कीमतों में भी भारी बढ़ोतरी

सिर्फ सप्लाई में देरी ही नहीं, बल्कि लागत भी तेजी से बढ़ी है। रिपोर्टों के अनुसार AMCA के शुरुआती प्रोटोटाइप के लिए प्रस्तावित GE F414 इंजन की कीमत पहले की तुलना में कई गुना बढ़ गई है। कंपनी ने इसकी वजह कोविड के बाद सप्लाई चेन संकट, कच्चे माल की महंगाई और वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियों को बताया है।

यूरोप की ओर क्यों देख रहा भारत?

भारत अब भविष्य के लड़ाकू विमान इंजन के लिए यूरोपीय विकल्पों पर गंभीरता से विचार कर रहा है। फ्रांस की Safran और ब्रिटेन की Rolls-Royce के साथ तकनीकी सहयोग और संयुक्त विकास की संभावनाओं पर चर्चा जारी है। यदि यह सहयोग सफल रहता है तो भारत पहली बार पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान के लिए स्वदेशी इंजन विकसित करने की दिशा में बड़ी छलांग लगा सकता है।

रक्षा विशेषज्ञ क्या मानते हैं?

रक्षा मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि लड़ाकू विमान जैसे रणनीतिक प्लेटफॉर्म के लिए किसी एक विदेशी आपूर्तिकर्ता पर अत्यधिक निर्भरता जोखिम बढ़ाती है। उनका तर्क है कि युद्ध जैसी परिस्थितियों में इंजन, स्पेयर पार्ट्स या तकनीकी सहायता की उपलब्धता राष्ट्रीय सुरक्षा को सीधे प्रभावित कर सकती है। इसलिए भारत के लिए दीर्घकालिक समाधान स्वदेशी इंजन तकनीक विकसित करना ही होगा।

आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम

भारत लंबे समय से रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में काम कर रहा है। यदि यूरोपीय सहयोग के साथ स्वदेशी इंजन विकास परियोजना समय पर आगे बढ़ती है, तो भविष्य में भारतीय लड़ाकू विमान विदेशी इंजन पर निर्भरता काफी हद तक कम कर सकते हैं। हालांकि तब तक तेजस और अन्य चौथी पीढ़ी के विमानों के लिए अमेरिकी इंजन भारत की आवश्यकता बने रहेंगे।

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